रक्षा बंधन – डी के निवातिया

रक्षा बंधन सिर्फ भाई बहन का ही नहीं, सभी से प्रेम का त्यौहार है रक्षा बंधन, जो भी परवाह करे तुम्हारी, उनके मान सम्मान का पर्व है रक्षा बंधन, …

मै तुझमें हुं पर तू मुझमे नहीं।

मै तुझमें हूं पर तुम मुझमे नहीं तुम जहां कहीं में भी वहीं मेरा तुझसे आगे कोई मोड़ नहीं मेरा ओर कोई जोड़ नहीं तेरा मिलना क्यों नहीं है …

स्वतंत्रता दिवस………..देवेश दीक्षित

स्वतंत्रता पाने की खातिर कितनों के दिमाग लगे शातिर अंग्रेजों ने जब तक राज़ किया था देशवासियों का अपने अपमान किया था क्रांतिकारी भी जोश में थे नेता अपने …

दूर नहीं रह सकता……..देवेश दीक्षित

कविता से अपनी मैं दूर रह नहीं सकता जो हुनर है ये मेरा उससे टूट नहीं सकता दुनिया चाहे कुछ भी कहे लिखना मैं छोड़ नहीं सकता ईश्वर का …

मन नहीं मानता……….देवेश दीक्षित 

जब तक न लिख लूं रचना मेरा मन नहीं मानता अकसर सोचता हूं लिखूं क्या मैं खुद नहीं जानता विषय मैं तलाशता रहता एकांत में बैठा रहता शब्दों को …

सवेरा………..देवेश दीक्षित

हुआ सवेरा किरणें आईं वो किरणें हम सब को भाईं उन किरणों से गया अंधियारा प्रकाश फैला हुआ उजियारा उस उजियारे ने जग को जगाया सबको अपने काम पर …

आईना………..देवेश दीक्षित 

आईना कोई दिखाए तो डरता है इंसान खुद आईना दिखाए तो मुस्कुराता है इंसान दूसरों की लाचारी पर इतराता है इंसान अपनी बारी पर मुंह छुपाता है इंसान ये …

आत्मा बसती है मेरी……………देवेश दीक्षित 

कविता में आत्मा बसती है मेरी बस यही एक आखिरी खूबी है मेरी न लिखूं तो चैन मुझे आता नहीं है इसके सिवा कुछ भाता नहीं है लिखते रहना …

मत कोसो मुझे………..देवेश दीक्षित

मत कोसो मुझे मैं फूल हूं गुलाब का डाली से तोड़ कर मुझे किया है इज़हार प्यार का दो दिल मिले तो जरिया मुझे बनाया परिवार से अलग कर …

क्या लिखूँ………….देवेश दीक्षित

क्या लिखूँ  मैं कैसे लिखूँ मैं भय का आभास है चहुं ओर अत्याचार, मारकाट और कोरोना का प्रभाव है किसी भी अखबार में पढ़ लो सब में यही खबर …

सोचता हूं मैं फिर से बालक बन जाऊं…………..देवेश दीक्षित

सोचता हूं मैं फिर से बालक बन जाऊं सोचता हूं मैं फिर से बालक बन जाऊं जात पात और भेद भाव से दूर हो जाऊं अपनी ही दुनिया में …

कारगिल दिवस………..देवेश दीक्षित

सन् 1999 में कारगिल का युद्ध शुरू हुआ था सहज नहीं था युद्ध ये हमारे जवानों का जो लहू बहा था कुछ घुसपैठिए घुस आए थे उनको मार भगाना …

अत्याचार………….. देवेश दीक्षित

अत्याचार की दुकान बन रहा अपना हिन्दुस्तान पल रहे कितने बेईमान कर रहे इसको शमशान बेशर्मी को लिया बांध अपराधों को लिया टांग दिखा रहे अपनी खुली हुई जांघ …

मगर से बैर – डी के निवातिया

दूसरों की मुखालफत में दिन रात रहता है, आग का दरिया बनकर पानी संग बहता है समझो कितना शातिर होगा वो शख्स, जो पानी में रहकर मगर से बैर …

शायद वो सिर्फ एक सपना ही होगा : भाग – ४

कितनी पीड़ा कितनी आशा सफलता की है क्या परिभाषा धनवान हो गए या नाम बनाया आखिर हमने है क्या पाया कभी बुरा रास्ता था अपनाया किसी का कभी ह्रदय …

अंसुओ से भीजी थी कमीज़ फिर भी मुस्कुरा कर चल दिए।

आंसुओ से भिजी थी कमीज फिर भी मुस्कुराकर चल दिए कर्ज में डूबे थे बेदम फिर भी फर्ज निभाने चल दिए ये कोई धूल नहीं वत्नफरोशी मिट्टी है घर …

रक्षाबंधन – अरूण कुमार झा बिट्टू

मिठाई की दुकानों पर कतारे लगने लगी रंग बिरंगी रखियो से बाजारे सजने लगी बहने चली हैं आज भाईयो के द्वार प्रेम उमड़ा हैं सबके चेहरे पे आज भाई …

“प्रकृति विनाशक आखिर क्यों है?”

बिस्तर  गोल  हुआ सर्दी का, अब  गर्मी   की  बारी  आई। आसमान  से आग  बरसती, त्राहिमाम्  दुनियाँ  चिल्लाई।   उफ़  गर्मी,  क्या  गर्मी  ये है, सूरज   की  हठधर्मी  ये  है। …

पदकवीरों का अभिनंदन

पदकवीरों का अभिनंदन बुलंद हौसलों की उड़ान से हर्ष ध्वनि आई टोक्यो के मैदान से महिला हॉकी में उत्कर्ष का संघर्ष जारी है पुरुष हॉकी में कांस्य जीत बाजी …