Category: अज्ञात कवि (रीतिकाल)

दाम की दाल छदाम के चाउर घी अँगुरीन लैँ दूरि दिखायो

दाम की दाल छदाम के चाउर घी अँगुरीन लैँ दूरि दिखायो । दोनो सो नोन धयो कछु आनि सबै तरकारी को नाम गनायो । विप्र बुलाय पुरोहित को अपनी …

दाजन दै दुर जीवन कौँ अरु लाजनि दै सजनी कुल वारे

दाजन दै दुर जीवन कौँ अरु लाजनि दै सजनी कुल वारे । साजन दै मन को नव नेम निवाजन दै मनमोहन प्यारे । गाजन दै ननदीन गुलाब बिराजन दै …

दाख पकी तब चोँचौ पकी जब बीन बज्यो बहिरो भयो कानो

दाख पकी तब चोँचौ पकी जब बीन बज्यो बहिरो भयो कानो । मेनका आय मिली तबहीँ जब देह ते कामहु दूरि परानो । जैसोई चाहत तैसो करै जग जाहिर …

तीनिहुँ लोग नचात फूँक मेँ मंत्र के सूत अभूत गती है

तीनिहुँ लोग नचात फूँक मेँ मंत्र के सूत अभूत गती है । आप सदा गुनवन्ति गुसाइन पाँयन पूजत प्रानपती है । पैनी चितौनि चलावति चेटक को न कियो बस …

ज्ञान घटे ठग चोर की सँगति मान घटे पर गेह के जाये

ञान घटे ठग चोर की सँगति मान घटे पर गेह के जाये । पाप घटे कछु पुन्य किये अरु रोग घटे कछु औषध खाये । प्रीति घटे कछु माँगन …

जे ते गजगौनी के नितँब हैँ विशद होत

जे ते गजगौनी के नितँब हैँ विशद होत , तेती तेती ताकी कटि पातरी परत जात । जेती जेती कटि खीन होति जाति तेते तेते , ताहि देखिबे को …

जानत जे हैँ सुजान तुम्हैँ तुम आपने जान गुमान गहे हो

जानत जे हैँ सुजान तुम्हैँ तुम आपने जान गुमान गहे हो । दूध औ पानी जुदे करिबे को जु कोऊ कहै तो कहा तुम कैहो । सेत ही रँग …

जाके लगे गृहकाज तजे अरु मातु पिता हित नात न राखै

जाके लगे गृहकाज तजे अरु मातु पिता हित नात न राखै । सागर लीन ह्वै चाकर चाह के धीरज हीन अधीर ह्वै भाखै । ब्याकुल मीन ज्योँ नेह नवीन …

जगमगी कचुँकी पसीजी स्वेद सीकरनि

जगमगी कचुँकी पसीजी स्वेद सीकरनि , डगमगी डग न सभाँरी सभँरति है । रँगपाल सरबती साड़ी की सलोट कल , कँपित करन न सवाँरी सँवरति है । बिलुलित बर …

चँदमयी चम्पक जराव जरकस मयी

चँदमयी चम्पक जराव जरकस मयी , आवत ही गैल वाके कमलमयी भई । कालिदास मोहमद आनँद बिनोदमयी , लालरँग मयी भयी बसुधा मई , ऎसी बनि बानिक सोँ मदन …

घोँघन मे बसिके न मिलै रस जे मुकतान पे चोँच चलैया

घोँघन मे बसिके न मिलै रस जे मुकतान पे चोँच चलैया । मालती की लतिका तजि कै केहि काम करील की कोटि कनैया । श्री महराज सरोवर हौ हम …

गौन कियो जब गौने की रैनि अली मिलि केलिनि लै ही चली है

गौन कियो जब गौने की रैनि अली मिलि केलिनि लै ही चली है । श्रीवृषभान ललीहि अली लै चलीँ लखि कान करी न भली है । सेज पै पेखि …

गही जब बाँहीँ तब करी तुम नाँहीँ

गही जब बाँहीँ तब करी तुम नाँहीँ , पाँव धरी पलकाहीँ नाँहीँ नाँहीँ के सुभाई हौ । चुँबन मे नाँहीँ औ अलिँगन मे नाँहीँ , परिरँभन मे नाँहीँ नाँहीँ …

खाय गईँ खसम भसम को रमाय लाईँ

खाय गईँ खसम भसम को रमाय लाईँ , सँपति नसाय दुहूँ कुल मेँ बिघन की । छाई भई साधुन की पाँति को पवित्र कीन्होँ , माईजी कहायकै लुगाई बनी …

कोमल अमल दल कमल नवल कैँधौँ

कोमल अमल दल कमल नवल कैँधौँ , कीन्होँ है विरँचि सब छवि को सहेट है । उदित प्रभाकर की दुति आनि छाई कैधौँ , चमकत चारु खात लोचन रपेट …

कोऊ न आयो उहाँ ते सखी री जहाँ मुरलीधर प्रान पियारे

कोऊ न आयो उहाँ ते सखी री जहाँ मुरलीधर प्रान पियारे । याही अँदेसे मे बैठी हुती उहि देस के धावन पौरि पुकारे । पाती दई धरि छाती लई …

कैँधौँ दृग सागर के आस पास स्यामताई

कैँधौँ दृग सागर के आस पास स्यामताई , ताही के ये अँकुर उलहि दुति बाढ़े हैँ । कैँधौँ प्रेम क्यारी जुग ताके ये चँहूधा रची , नील मनि सरन …

कैँधोँ तुव चाकर चतुर अनियारे पैठि

कैँधोँ तुव चाकर चतुर अनियारे पैठि , हृदय पयोधि मन मोती के कढ़ैया हैँ । कैँधौँ राजहँस मनसिज के सनेही बनि , ताकी हुति तीछन कटाछन चलैया हैँ । …

कुँद की कली सी दँत पाँति कौमुदी सी दीसी

कुँद की कली सी दँत पाँति कौमुदी सी दीसी , बिच बिच मीसी रेख अमीसी गरकि जात । बीरी त्योँ रची सी बिरची सी लखै तिरछी सी , रीसी …

कामरी कारी कँधा पर देखि अहीरहिँ बोलि सबै ठहरायो

कामरी कारी कँधा पर देखि अहीरहिँ बोलि सबै ठहरायो । जोई है सोई है मेरो तो जीव है याको मैँ पाय सभी कुछ पायो । कामरी लीन्होँ उढ़ाय तुरँतहि …

कान्ह की बाँकी चितौनि चुभी झुकि

कान्ह की बाँकी चितौनि चुभी झुकि , काल्हि झाँकी है ग्वालि गवाछनि । देखी है नोखी सी चोखी सी कोरिन , ओछे फिरै उभरे चित जाछनि। मारेइ जाति निहारै …

कज्जल के कूट पर दीप शिखा सोती है कि

कज्जल के कूट पर दीप शिखा सोती है कि , श्याम घन मँडल मे दामिनी की धारा है । भामिनी के अँक मे कलाधर की कोर है कि , …

कँज से चरण देव गढ़ी से गुलफ शुभ

कँज से चरण देव गढ़ी से गुलफ शुभ , कदली से जँघ कटि सिँघ पँहुचत है । नाभि है गँभीर व्याल रोमावली कुँभ कुच , भुज ग्रीव भाय कैसी …

ऊँची सी उसासैँ लै लै पूछत है परोसिन सोँ

ऊँची सी उसासैँ लै लै पूछत है परोसिन सोँ , मेरे उर कठिन कठोर भए बाँके हैँ । ताके अति सोचन तेँ कछू ना सोहात मोहिँ , कीजिये उपाय …

आहि कै कराहि कांपि कृश तन बैठी आय

आहि कै कराहि कांपि कृश तन बैठी आय , चाहत सखी सो कहिबे को पै न कहि जाय । फेरि मसि भाजन मँगायो लिखिबे को कछू , चाहत कलम …