Category: सुनील गुप्ता ‘श्वेत’

सितम सह के तू जिया ना कर…

सितम सह के तू जिया ना कर. जहर के घूँट यूं पिया ना कर.. खुद ही उठा ले शमशीर अपने हाथों में. करे कोई हिफाजत ये इल्तेजा ना कर.. आप ना उठाई आवाज जुल्म के खिलाफ तो. इल्जाम दूसरों पर तू किया ना कर.. सजा-ए-मौत है मन्जूर मुझे ऐ ‘श्वेत’. बद्दुआ जीने की मुझको दिया ना कर..

आज हर इन्सान यहाँ, लाश बन गया है क्यों ???

आज हर इन्सान यहाँ, लाश बन गया है क्यों ? रिश्तों की जगह पैसा, एहसास बन गया है क्यों ?? तेज रफ्तारों ने यहाँ, छीनी है कई जिन्दगियाँ. कारों में चलने वाला, यमराज बन गया है क्यों ?? सत्यमेव-जयते, सूक्त वक्य है जहाँ का. झूठ वहाँ का गीता-कुरान बन गया है क्यों ?? जितना बडा नेता, उतना ही बडा चोर. हर लुटेरा इस देश का, निगेहबान बन गया है क्यों ??

इस दुनियां का सच…

हमने एक कहानी बनाई, उसको इतनी दफे सुनाई, कि अब हकीकत, झूठ लगे है. और कहानी, लगती है सच्ची… इस दुनियां में, सच क्या है? और, झूठ क्या?? जिस सच को, दबा और कुचल दिया जाता है, वो झूठ! और जिस झूठ को, बढा-चढाकर और कहानियों में गूंथकर सुनाया जाता है, वही होता है, इस दुनियां का, अन्तिम और अकाट्य, सत्य!! दबे-कुचले होते हैं, गरीब! और जिनकी कहानियां होती हैं, वो होते हैं अमीर!! इस दुनियां का, बस इतना सच है, ये दुनियां, बस इतनी ही सच्ची!!!

एक नया सा जहाँ बसायेंगे…

एक नया सा जहाँ बसायेंगे. शामियाने नये सजायेंगे.. जहाँ खुशियों की बारिशें होंगी. गम की ना कोई भी जगह होगी.. रात होगी तो बस सुकूं के लिये. खिलखिलाती हुई सुबह होगी.. कोई किसी से ना नफरत करेगा. करेगा प्यार, मोहब्बत करेगा.. जहाँ बच्चे ना भूखे सोयेंगे. अपना बचपन कभी ना खोयेंगे.. देश का होगा, विकास जहाँ. नेता होंगे सुभाष जैसे जहाँ.. जुल्म की दस्तां नहीं होगी. अश्क से आँख ना पुरनम होगी.. राम-रहीम में, होगा ना कोई फर्क यहाँ. ऐ खुदा तू भी, रह सकेगा जहाँ – २.. ना बना पाये, इस धरती को हम, स्वर्ग तो क्या. इन्सां के रहने के, काबिल तो बना सकते हैं… इन्सां के रहने के, काबिल तो बना सकते हैं…

जब तक आप ना बीते, तब तक हम सोते ही रह्ते हैं…

कोई नहीं कुछ करता है, इस बात पर रोते रह्ते हैं. पर जब तक आप ना बीते, तब तक हम सोते ही रह्ते हैं.. उस पर बीत रही है, उससे हमको क्या लेना-देना. इस पचडे में पडने से, अच्छा है यारा दूर रहना.. कर्तव्यों से मुंह चुराकर अपना, हम सबकुछ खोते रह्ते हैं… पर जब तक आप ना बीते, तब तक हम सोते ही रह्ते हैं.. गर आग पडोस में लगी है, अपने घर तक तो आनी ही है. रेत में मुंह छुपा लेना, ये बात तो बेमानी ही है.. क्यों अत्याचारों का बोझ, हम जीवन भर ढोते रहते हैं??? पर जब तक आप ना बीते, तब तक हम सोते ही रह्ते हैं… इन्सां वो भी, इन्सां हम भी,  वो एक हैं, हम हैं अनेक. क्यों ना मिलकर हम सब, बन जयें एक ताकत नेक.. नींद उडा दें उनकी, जो हमें लडाकर, चैन से सोते रहते हैं… पर …

कोई फैसला तो किया करो….

अच्छा हो कि बुरा हो, कोई फैसला तो किया करो. एक ओहदा अता हुआ  है  तुम्हें, जरा इसका तो हक अदा करो… तुम जिस जगह पहुँच गये, हो वहाँ के नही हकदार तुम. पर क्या कुछ ऐसा भी है, कि हो नही खुद्दार तुम.. यूं आँख मूंदे रात कब तक, अब तो कोई सुबह करो… एक ओहदा अता हुआ  है  तुम्हें, जरा इसका तो हक अदा करो… कोई चुप कहे तो चुप रहे, कहे बोल तो तुम बोलते हो. कुछ तो तुम्हें भी अक्ल होगी, कुछ तो तुम भी सोचते हो.. कुछ कर नहीं सकते हो तो, कम से कम दुआ करो… एक ओहदा अता हुआ  है तुम्हें, जरा इसका तो हक अदा करो… इस देश के तुम बन रहे, क्यों इक नए कलंक हो. अब तुम खुद ही फैसला करो, तुम राजा हो या रंक हो.. कि अब छोड अपनी गद्दी को, इस देश का भला करो… …

घोटालों के दोषी…

यूँ ही छत की मुन्डेर पर खडे मैं सोच रहा था, हाल ही में हुए घोटालों के बारे में, और उनसे जुडे लोगों के बारे में. मीडिया ने बताया …

मजा किसी को, सजा किसी को….

तू करके चोरी फंसा किसी को. मजा किसी को, सजा किसी को.. जो गर तरक्की तुझे है करना. दबंग बनके दबा किसी को.. CWG, 2G, आदर्श, चारा. तू कर घोटाले, फंसा किसी को.. सफेद कपडे, दिलों में कालिख. दिखा किसी को, छुपा किसी को.. कसाब पर कर करोडों खर्चे. कमाई किसी की, लुटा किसी को.. ये जनता तो है ही गूंगी-बहरी. कि चाहे जैसे, नचा किसी को.. हजारों वादे हम करके मुकरे. ना पूरा हमने किया किसी को.. भगवान है, अब तो पैसा-पावर. कि अब तो सजदे अता इसी को.. मँहगाई कम होगी सब्सिडी से. कि दे किसी को, लुभा किसी को.. ये काला धन रख स्विस तिजोरी में. कि देश अपना लुटा …

सच और झूठ…

सच और झूठ में, फर्क बस इतना है. जो हम सुनना चहते हैं, वो है सच! और जो कहते हैं, वो झूठ!! ना कुछ सच है, और ना ही कुछ झूठ… बस हमरी सोच है!!!

स्वर्ग तो ‘माँ’ की ही गोद मिले है…

मुद्दत बाद वो हमसे मिले हैं. जाने कैसे दिल पिघले हैं.. ये दर्द ना पूछो किसने दिये हैं. हमने तो अपने होंठ सिले हैं.. इश्क में दीवाली पर ऐ ‘श्वेत’. दीप नहीं, दिल ही तो जले हैं.. झूठ की आँखों पर पट्टी है. पर सच के तो होंठ सिले हैं.. दोनों जहाँ जब भटके तो समझे. स्वर्ग तो ‘माँ’ की ही गोद मिले है…  

वर्तमान!!!

वक्त की चदर ने सब कुछ ढंक रखा है. जैसे-जैसे, परत-दर-परत, ये खुलती जाती हैं.. हम भविष्य के चेहरे से, रू-ब-रू होते जाते हैं… और जैसे-जैसे गुजरते जाते हैं, खो जाते हैं, वक्त के आगोश में, कहे-अनकहे, सुलझे-अनसुलझे, अनगिनत राज!!! कुछ भी नहीं रह्ता, संज्ञान में… ना भविष्य, और ना ही भूत… ये सब वक्त का ही मायाजाल है!! गर इसके मायाजाल से कुछ अनछुआ है, तो वो है, वर्तमान!!! जिसे हम जी सकते हैं.. महसूस कर सकते हैं… और बदल सकते हैं… अपनी सोच से…..

किसी अपने की दुआओं का असर होता है…

कोई डूबता सा गर दरिया में पार होता है. ये किसी अपने की दुआओं का असर होता है.. बस उन्ही राहों का आसान सफर होता है. जिनको अपने पर भरोसा जो अगर होता है.. छोड हमें यहाँ, चले जाते हैं जो उस नगरी. वहाँ रहने को क्या, उनका कोई घर होता है???…

कभी तो अश्क की रहो में, इक मुस्कान ले के आ…

कभी तो अश्क की रहों में, इक मुस्कान ले के आ. इस कन्क्रीट के जंगल में, इक इन्सान ले के आ.. ना मन्दिर ला, ना मस्जिद ला, ना गुरूद्वारे, ना गिरिजाघर. जो ला सकता है तो सचमुच का कोई, भगवन ले के आ.. शहर से दूर शमसानों में ही जिन्दा है अब सुकूं. शहर ला दो सुकूं का या कि फिर शमसान ले के आ.. नहीं आता है मिलने, हमसे कोई, रहते हैं तन्हा हम. इस कॉफी के टेबल पर, कोई मेहमान ले के आ.. इस घर में भी, रिश्ते सभी परये हो गये. घर कह सकूं, ऐसा कोई मकान ले के आ.. खत्म हो जाए दुनियां से, ये भ्रष्टाचार, ये नफरत. ऐ मेरे “श्वेत” जा ऐसा कोई वरदन ले के आ..

इस शहर मे अकेला हूँ मैं…

इस दौडते फिरते शहर में. तन्हाई का मेला हूँ मैं.. इस शहर मे अकेला  हूँ मैं… कन्क्रीट का जंगल है ये. अमानवता का संदल है ये.. इससे परे इस शहर में. मानवता का झमेला हूँ मैं.. इस शहर मे अकेला  हूँ मैं… तन्हा चला हूँ राहों पर मैं. खुद को बचकर स्याहों से मैं.. अन्धेरे से इस शहर में. उगता हुआ सवेरा हूँ मै.. इस शहर मे अकेला  हूँ मैं…  

याद मुझे कोई आता बहोत पुराना है…

दिल से दर्द का नाता बहोत पुराना है. याद मुझे कोई आता बहोत पुराना है.. जाने कबसे सुन रहा हूँ लोगों की, कोई तो सुन लो मुझे भी कुछ सुनाना है.. आँखें उसकी जाने कबसे पथरा गयी, हँसी उडाओ उसकी उसे रुलाना है.. इश्क है उनसे बात बहोत पुरानी है, सबने सुना पर उनको भी तो सुनाना है.. लूटो, मारो, छीनो, कटो, कत्ल करो, राम-रहीम के चक्कर भी तो लगाना है..

जरा सोचकर देखियेगा…

कभी पेडॊं की झुरमुट में, छुप जाता है ऐसे. छोटे बच्चे की तरह मुझको रिझा रहा हो जैसे. और कहता है, आज कल वक्त किसके पास है, हमसे बात करने की… कभी आधा तो कभी पूरा मुखडा दिखाता है और कभी छुप जाता है एक पखवाडे के लिए… दूर आसमान में, अपने आप में एकलौता, और उसके साथ, हजारों खामोश तारे… हाँ! वही जिसे हम बचपन में लपकने को दौडते थे समझकर लड्डू… जिसमें दिखती थी हमें, वो चरखा चलाती बुढिया, उडते हुए संता क्लाज… कितने बहाने थे हमारे पास उसे देखने के, उसकी कहानियों में, खुद को पाने की अपनी प्रेयसी को, उस जैसा बतने की कहां खो गयी, ये सारी बातें? क्यों करता है वो, हमसे शिकायत?? क्यों नही है वक्त हमरे पास, हमरे बचपन के साथियों के लिए??? जरा सोचकर देखियेगा…