Category: प्रियंका ‘अलका’

विरह – प्रियंका ‘अलका’

बादल सूनाधरा है प्यासीघूँट- घूँट तेराप्रेम पीया जोबन गई तेरी दासीबन गई तेरी दासी…….आग की लपटें धधके जैसे विरह की ज्वालाफैले वैसे..अब क्या सूरजक्या चंदा देखूँविरह में मैं जग …

चुप्पी – प्रियंका ‘अलका’

तुमने हर बारमेरी बातों कोअनसुना कियाऔर अपने विचारों मेंलीन रहे…..क्या तुम्हें मालूम हैहर बार तुममुझे खोते गएऔर मैंखुद मेंखोती गई…..शायद…जब समयचादर बदलेतब तुम चुप्पी तोड़बहना चाहो..तो कह देती हूँ…..तुम्हारी …

एक कप चाय……. -प्रियंका ‘अलका’

 मैंमेरी उदासीऔर एक कप चाय……..ढलती हुई शामथमता हुआ शोरथकता हुआ मनऔर एक कप चाय……उलझे रिश्तेउलझे हालातबेबस सोचऔर एक कप चाय……….बंद मुट्ठी सेरेत का फिसलनापांवों के नीचे सेलहरों का बहनादेखते …

भाव-2 – प्रियंका ‘अलका’

 कभी-कभी मन के भावपानी से भरेउस काले बादल के समानहो जाते हैंजिसका पानीसीप की मुँह में जाकरबहुमूल्य मोती कानिर्माण कर सकता हैकिंतुजाने किस विवशता में फँसावो बरस नहीं पाताकेवल …

सपनों का बोझ – प्रियंका ‘अलका’

हम दोनों जानते हैंएक होने के बाद भीहम दोनों के सपने अलग हैं…….कहते हैं -खाना धीमी आँच पर पकाने सेखाना अच्छा पकता है ।मैं तुम्हारे सपनों को समझती हूँपर …

भाव – प्रियंका ‘अलका’

 एक कागज उजलीएक स्याही नीलीएक मन का कुँआरंगों से भरा है ।दृगो का काजलजो चमक रहा है,दबा भाव भीदहक रहा है । ।नियमों का फंदाकई रंगों में डूबाखींच-खींच मुझेजो …

समझ से परे – प्रियंका ‘अलका’

तुम कहते होतुम्हें मेरी रचनाएँसमझ में नहीं आतीफिर भी तुम चाहते होमैं हमेशा लिखती रहूँ ……मैं तुम्हारी बातसमझ सकती हूँ ।धरा पर आ रही बूंदेंकहीं पत्तों पर हींअटकी रह …

ज्वर – प्रियंका ‘अलका’

 उसका मन तेज तप रहा हैज्वर की तापअपनी चरम सीमा पर हैउसकी तड़पऔर छटपटाहटबढ़ती जा रही हैशीतलता की तलाश मेंवो बार-बारगीली पट्टी कास्पर्श खोज रही है ।भूल गई हैवो …

छल -प्रियंका ‘अलका’

तुम्हें नहीं मालूम मैंने तुमसे बहुत सारी बाते छिपा कर रखी हैं बहुत सारी……… जैसे, रोटियां बनाते वक्त सबसे गोल रोटी मैं तुम्हारे लिए रखती हूँ, तुम्हारे पसंद की …

बोलो प्रिय- प्रियंका ‘अलका’

बोलो प्रिय तेरी फैली दृगो में आज कैसी उलझन क्यों तेरी बातो की लड़ी का आज टूटा स्पंदन। उर में तेरी दबी है आज कैसी पीड़ा जो सुनकर मेरी …

भारी है….. -प्रियंका ‘अलका’

आज साँस भारी है जज्बात भारी है तेरी कही हर बात आज बेहिसाब भारी है । आज मुझ तक पहुँचती हवाऐं भारी हैं किरनों में लिपटी आशाऐं भारी हैं …

दाग – प्रियंका ‘अलका’

दर्पण -दर्पण देख रही थी रूप-रंग के जटिल भेद को खड़े -खड़े निर्रेद रही थी । अंदर -बाहर देख-देख दृगे जब थोड़ी शांत हुई, दर्पण पर फैले असंख्य दागो …

किसान

बोल रे मन! ये कैसी दुनिया, जिसका उपजा खाते वही तिरस्कृत रहते। जल-जल जिसका लहू, तप-तप पसीना बनता, धरा के ह्रदय को चीर-चीर, अपनी उम्मीदें बोता, पर न दुख …