Category: गरिमा मिश्रा

नक़ाब

कभी फेसबुक पोस्ट के लिए, कभी इंस्टा की स्टोरी के लिए, रंग-बिरंगे ‘फ़िल्टरस’ की आड़ में, ‘लाइक्स’ और ‘कमैंट्स’ की चाहत में, हम रोज़ नक़ाब बदलते ही हैं | …

पलायन

कहीं रात के सन्नाटे में, तो कहीं तपती दोपहरी में, मोहल्ले, कूचे, गलियों में, कुछ क़दमों ने शहर छोड़ा है। बस्तियों से दूर, बहुत दूर, उजड़ी, वीरान सड़कों पर, …

चुनाव और उम्मीदें

इस लम्बी सी कतार मेंलगी हैं मीलों लम्बी उम्मीदें,कुछ हैं बिजली-पानी सी,कुछ सर पर छत सी उम्मीदें…हर शख्स है चुपचाप खड़ा,पर नज़रें बातें करती हैं,हर चेहरे के मन की …

जंगल के सूखे पत्ते

जंगल के सूखे पत्ते एक कहानी कहते हैं,अब टहनी-टहनी पर कुछ उदास चेहरे रहते हैं…बरखा की राह तक-तक के हैं इनकी आँखें सूख चुकी,अब हरियाली की यादें और बातें …

दो आँखें

दूर किसी कोने से कुछ देख रही हैं दो आँखें,जल रहा है हर पेड़-पौधा, बगीचा-बाग़,घर-घर के आँगन में लगी है आग।कतरा-कतरा झुलस रही है चेहरों की मुस्कानतिनका-तिनका टूट रहा …

मेज़ पर पड़ी कलम

मेज़ पर पड़ी कलम पुकारती है तुझे,खींचती है तुझे भावों की डोरी से..सुनाती है कभी आधी, कभी पूरी कहानी,तेरे लफ़्ज़ों को गाती है अपनी ज़ुबानी..मेज़ पर पड़ी कलम पुकारती …

खयालों का शहर

हर मन में इक खयालों का शहर बसता है…इक ज़हरीले नाग सा, हमें धीरे-धीरे डसता है..बेमाने, बेख़ौफ़, बेपरवाह से हैं इस शहर के बाशिंदे…चीते की रफ़्तार से, बेलगाम घोड़ों …

ख़्वाब सो रहे हैं

बेसुध-बेफिक्र कुछ ख़्वाब सो रहे हैं,इन्हें सोने दो।अलसाए-सुस्ताये से अँगड़ाई लेते ख़्वाब,इन्हें सोने दो।सुना है ख़्वाबों की आँखें नहीं होती,पर नींद तो इन्हें भी आती होगी,कहने-सुनने की इनकी भी …

क्या तब भी तुम न बोलोगे

जब सॉंस-सॉंस पर हो भारी,हो ऑंखों पर पट्टी कारी,जब शब्दों पर सर कटने लगे,और बातों पर शव बिछने लगे,क्या तब भी तुम न बोलोगेऔर सत्य से ऑंखें मींचोगे…जब ‘कल्पना’ …

मेरे गाँव की सड़क

कहीं टूटती सी, कहीं फूटती सी, मेरे गाँव के बीच से गुज़रती ये टूटी-फूटी सड़क..जानती है दास्ताँ, हर कच्चे-अधपक्के मकान की, हर खेत,हर खलिहान की…ये सड़क जानती है,कब कल्लू …