Category: सर्वेश कुमार मारुत

ओ! नन्हें बादल के टुकड़े

ओ! नन्हे बादल के टुकड़े,  ज़रा एक झलक दिखला जाना।देखो गर्मी पड़ी भयानक,आकर इसको टहला जाना।अम्बर बना है आग की थाली,अपने दोस्तों के साथ तुम मिलकर।जैसा हो और जितनी …

मैं तुझमें ही खो जाऊँ

( 1)तू मुझमें छिपी , मैं तुझमें छिपा।मैं तुझ में ही खो जाऊँ, मैं अपनी प्यास बुझाऊँ।तरसूँ मैं तो तेरे बिन, फिर और कहाँ मैं जाऊँ?तेरे रूप का ऐसा …

गुब्बारों का लगा है मेला

गुब्बारों का लगा है मेला।एक रुपए में ले लो जैसा।लाल,गुलाबी,नीला,पीला।पैसे लेकर दौड़ी शीला।माँग लिया गुब्बारा नीला।इधर से डोला- उधर से डोला।श्यामू,चिंटू,सीता,लीला।खेल सभी ने मिलकर खेला।चीख उठी तब उधर से …

हे मातृभूमि! तेरी ख़ातिर

हे मातृभूमि! तेरी ख़ातिर,            लेकर यह अभियान चले।अपनी जान हथेली पर हम,            तुझ पर होने बलिदान चले।हम घट-घट के वासी हैं,            जो भी नज़र उठा चले।हम वीर नहीं-हम वीर …

हर कोई वेगाना है

हर कोई वेग़ाना है,सभी का अपना अपना फ़साना है।उलझते जा रहे फ़ासलों क्यों?ये वन्दा कुछ दीवाना है।ज़िन्दगी जीना चाहते हैं,ख़्वाहिशों का आशियां है।रुक चली ज़िन्दगी उलझती राहों में,पर हौंसलों …

पैसा

पैसासंसार में भीहड़ है कितनी, और रूप भी है कैसा-कैसा?संसार लगे छोटा अब तो, क्योंकि बड़ा यहां पैसा।संसार तुच्छ है इसके बिन, चला यहां है क्यों पैसा?इसे रूप दिया …

मछली-मछली

मछली- मछलीमछली- मछली इधर तो आ,आकर अपना नाम बता।डर मत मछली आ भी जा,और आकर के खाना खा जा।मछली-मछली मान भी जा,हठ मत कर और न शर्मा।तुझको हाथ लगाऊँ …

अब कॉटा बन चुका शरीर

क्षीण तन मन दुर्बल,अब काँटा बन चुका शरीर ।चली जा रही हो वह ऐसे,चली हों लहरें जिसके तीर।पग पग पर करहाती ऐसे,छत्ते बिन मधुमक्खी जैसे।डगर छोटी चलती जा रही,जैसे …

क्यों चली जिंदगी ?

क्यों चली यह जिंदगी?, पर रुकतीनहीं ना जाने क्यों ?क्यों जन्में हैं यहाँ ?पर मरे यहाँ ना जाने क्यों?क्यों शिशु रोता ऐसे था?,पर हँस पड़ा ना जाने क्यों ?क्यों …

सच्चाई अब डूब चुकी

सच्चाई अब डूब चुकी है, न जाने उनकी आँखों से। डुबा दिया देखो हम सबको, न जाने क्यों अपने हालातों से। जख़्म दिया ऐसा जिसने, उसने क्यों अपनी बातों …

कैसा खेल यह तूने खेला है ?

कैसा खेल यह तूने खेला है? लगा दिया यहाँ रेला है। छायी हर तरफ उदासी है, और लगा दिया तूने मेला है। हम आँखों में उम्मीद लगाये, ढूँढे ऐसा …

मैं पत्थर की मूरत हूँ

मैं पत्थर की मूरत हूँ! फिर क्यों मुझे बुलवाते हो? तुमने क्या कहा मैंने क्या सुना?, हम तो अनभिज्ञ है इससे। ना तो पत्थर बोले- ना ही बोले मूरत, …

नारी

देखो आती है कैसे?,अपने हाथों में बारी। लड़ने को तैयार हो चुकीं,देखो अब हम सब नारी। जाग गयीं और जाग चुकीं हैं,अपने अत्याचारों को लेकर ,सुलगाई अब यह चिंगारी। …

“मैं पानी की बूँद हूँ छोटी”

मैं पानी की बूँद हूँ छोटी, मैं तेरी प्यास बुझाऊँ। पी लेगा यदि तू मुझको , मैं तुझको तृप्त कराऊँ। मैं छोटी सी बूँद हूँ, फ़िर क्यों न पहचाने? …

दीर्घ पथ पर एक अबला

दीर्घ पथ पर एक अबला ,अपने क्षण को काट रही थी। नेत्र बुझे उसके दोनों थे,शायद आँखोँ में प्यास रही थी। नभ में अवतरित मेघ काले थे,मन मन में …