Category: संजय कुमार मौर्य

तू किनारे से हाथ देगा

तू किनारे से हाथ देगा मुझे लगता नहीं तू मेरा साथ देगा मुझे लगता नहीं ऐ मौत कभी तो आएगा इतना मुकर्रर है मगर मुझे मात देगा मुझे लगता …

आओ तूफानों में

आओ तूफानों में नाव चलाया जाए अपनी मकसद लहरों से बताया जाए इन जिन्दा गलियों में खामोशी क्यों है मन झूमे ऐसा गीत कोई सुनाया जाए बहुत हुआ खेल …

तेरे जिस्म में

तेरे जिस्म में रुह कितना आजाद है हमसे पूछ किसी मसले का क्या निजाद है हमसे पूछ तुझे क्यों लगा कि उसका एहसान है तेरा होना तेरा होकर जीना …

तेरे जिस्म में

तेरे जिस्म में रुह कितना आजाद है हमसे पूछ किसी मसले का क्या निजाद है हमसे पूछ तुझे क्यों लगा कि उसका एहसान है तेरा होना तेरा होकर जीना …

आओ तूफानों में

आओ तूफानों में नाव चलाया जाए अपनी मकसद लहरों से बताया जाए इन जिन्दा गलियों में खामोशी क्यों है मन झूमे ऐसा गीत कोई सुनाया जाए बहुत हुआ खेल …

तू किनारे से हाथ देगा मुझे लगता नहीं

तू किनारे से हाथ देगा मुझे लगता नहीं तू मेरा साथ देगा मुझे लगता नहीं ऐ मौत कभी तो आएगी इतना मुकर्रर है मगर मुझे मात देगा मुझे लगता …

इतिहास

अभी अभी गुजरा है रुढि़यों का अंधविश्वासों का गुलामी का तानाशाही का गटर के कीड़ों के मानिंद उफनते इंसानी मूल्यों का इतिहास। अब बन रहा है अमीरों के कदमों …

कभी तो याद तेरी

कभी तो याद तेरी पलकों को भिगोएगी न सही महफिल में, तन्हाई में रोएगी रूठकर कतराने लगी मुझसे मेरी परछाइयां सीने में कांटों सी तरह चुभने लगी तन्हाइयां गम …

मेरी अज्ञात राहेंं

अपना कोई पथ नहीं और न हो कोई लक्ष्य सखा की भी आवश्यकता नहीं अकेले अग्रसर होते जाना है बेधड़क अभय होकर परन्तु किधर कुछ भी ज्ञात नहीं मुझे …

अनुभव

क्षण क्षण अनुभव करता रहता हृदय मनहर सी छाप छोड़ती बातें जो अन्तःकरण को प्रेम में विकल कर जाते स्नेह प्रीत की एक छोटी सी सुन्दर मनभावन सी बगिया …

पेट और पेट के लिए

जब निवाले तक के लिए करना था मोहताज तो हड्डियों के ढांचे में के आवरण में सागर सा गहरा नितान्त अतृप्त जो मजबूरियों से परे हो अपनी आवश्यकताओं के …

कोई अनुभव

कोई अनुभव नित सर पर मंडराएगा प्यारे निशा की गोद में हँसता चाँद जगाएगा प्यारे कोसों दूर तक गगन में तारों की टिमटिम काली ओढ़नी पर जैसे सितारों की …