Category: नीरज सारंग

स्वप्न में ही मोहें प्रभु के संग अभिनय करे दे

ओ री! बांवरी बयारिया सुन इक मोरी बतिया सूनी मन की नगरिया, बीते दिन नाहीं रतिया पल-पल मोरे नैंन विरह के कोमल गीत गायें सुहावन सुबह न लागे, मनभावन …

वसुंधरा जैसी परी की है तू जननी

दक्षिण-सागर में है मयूरों की सभ्यता उनके नीले पंखों ने सागर को रंगा पंख-किलकारियों से सिन्धु-पवन आयी मुझे भी ले चल, जिधर तू गाते चली तू पर से उत्पन्न …

संदेही सरि की मँझधार में हो जाती

हिय-वीणा पर बज रहे कीर्तन भजन आरती संदेही सरि की मँझधार में हो जाती मेरे सुर की तरणी-दिशा में विकार की सुध होने लगती तेरे मधुर मुग्ध मधु मंजरी …