Category: नीरज दइया

अपने हिस्से की छाया

मैं थक गया ठूंठ कहता है- यह भी कोई जीना है लाओ तुम्हारी कुलहाड़ी । मैं पहचानता हूं प्रार्थना के भीतर छिपी लाचारी ठूंठ करता है प्रणाम मुक्ति की …

घर

थूं अर म्हैं पाळ्‌यो हजार-हजार रंगां रो एक सुपनो। थारी अर म्हारी दीठ रो थारै अर म्हारै सुपनां रो एक घर हो जिको अबै धरती माथै कदैई नीं चिणीजैला। …

जानना चाहता हूँ मैं

सूरज-चांद की गुड़कती गेंदों पर नहीं रीझूंगा मैं जानना चाहता हूँ मैं कि शेषनाग के फन पर टिकी हुई है या किसी बैल के सींगों पर यह धरती ! जानना …

दादी की तरह दुनिया

निरन्तर बीमारी में अधरझूल झूल रही है दादी । यह झूलना लगभग ख़त्म ही समझो अब लेकिन मन नहीं भरता, दादी का । दादी ! क्यों है तुम्हारा जीये जाने …

मैंने सहेज कर रखी है

तुम्हारी स्मृति अभी तक नहीं भूली मुझ तक पहुंचने के रास्ते मैंने सहेज कर रखी है तुम्हारी स्मृति अपने सपनों के संग ! सीमाएं सदैव बदली और कुछ बदले हम …

चालो माजी कोटगेट

बड़ी गवाड़ बीकानेर माथै एक तांगैवाळो हो जिको हरेक चलतै नै बकारतो- “चालो माजी कोटगेट।” बो काल म्हारै सपनै में आयो। म्हैं बीं नै ओळख लियो कारण कै एक …

मूंढै पाटी

म्हैं म्हारै दुख बाबत कीं कैवूं किंयां ? छत्तीस बरसां सूं म्हैं म्हारै मूंढै तो पाटी बांध्योड़ी है । इत्ता बरसां पछै ई म्हांरी गूंगी जात नै थे ओळख नीं …