Category: नागार्जुन

फुहारों वाली बारिश

जाने, किधर से चुपचाप आकर हाथी सामने लेट गए हैं, जाने किधर से चुपचाप आकर हाथी सामने बैठ गए हैं ! पहाड़ों-जैसे अति विशाल आयतनोंवाले पाँच-सात हाथी सामने–बिल्कुल निकट जम …

नाहक ही डर गई, हुज़ूर

भुक्खड़ के हाथों में यह बन्दूक कहाँ से आई एस० डी० ओ० की गुड़िया बीबी सपने में घिघियाई बच्चे जागे, नौकर जागा, आया आई पास साहेब थे बाहर, घर …

तीनों बन्दर बापू के

बापू के भी ताऊ निकले तीनों बन्दर बापू के ! सरल सूत्र उलझाऊ निकले तीनों बन्दर बापू के ! सचमुच जीवनदानी निकले तीनों बन्दर बापू के ! ग्यानी निकले, ध्यानी निकले तीनों …

जान भर रहे हैं जंगल में

गीली भादों रैन अमावस कैसे ये नीलम उजास के अच्छत छींट रहे जंगल में कितना अद्भुत योगदान है इनका भी वर्षा–मंगल में लगता है ये ही जीतेंगे शक्ति प्रदर्शन …

चंदू, मैंने सपना देखा

चंदू, मैंने सपना देखा, उछल रहे तुम ज्यों हिरनौटा चंदू, मैंने सपना देखा, अमुआ से हूँ पटना लौटा चंदू, मैंने सपना देखा, तुम्हें खोजते बद्री बाबू चंदू,मैंने सपना देखा, …

घिन तो नहीं आती है

पूरी स्पीड में है ट्राम खाती है दचके पै दचके सटता है बदन से बदन पसीने से लथपथ । छूती है निगाहों को कत्थई दांतों की मोटी मुस्कान बेतरतीब …

खुरदरे पैर

खुब गए दूधिया निगाहों में फटी बिवाइयोंवाले खुरदरे पैर धँस गए कुसुम-कोमल मन में गुट्ठल घट्ठोंवाले कुलिश-कठोर पैर दे रहे थे गति रबड़-विहीन ठूँठ पैडलों को चला रहे थे …

काले-काले

काले-काले ऋतु-रंग काली-काली घन-घटा काले-काले गिरि श्रृंग काली-काली छवि-छटा काले-काले परिवेश काली-काली करतूत काली-काली करतूत काले-काले परिवेश काली-काली मँहगाई काले-काले अध्यादेश

कालिदास

कालिदास! सच-सच बतलाना इन्दुमती के मृत्युशोक से अज रोया या तुम रोये थे? कालिदास! सच-सच बतलाना! शिवजी की तीसरी आँख से निकली हुई महाज्वाला में घृत-मिश्रित सूखी समिधा-सम कामदेव …

उनको प्रणाम

जो नहीं हो सके पूर्ण–काम मैं उनको करता हूँ प्रणाम । कुछ कंठित औ’ कुछ लक्ष्य–भ्रष्ट जिनके अभिमंत्रित तीर हुए; रण की समाप्ति के पहले ही जो वीर रिक्त …

इन घुच्ची आँखों में

क्या नहीं है इन घुच्ची आँखों में इन शातिर निगाहों में मुझे तो बहुत कुछ प्रतिफलित लग रहा है! नफरत की धधकती भट्टियाँ… प्यार का अनूठा रसायन… अपूर्व विक्षोभ… …

आये दिन बहार के

स्वेत-स्याम-रतनार’ अँखिया निहार के सिण्डकेटी प्रभुओं की पग-धूर झार के लौटे हैं दिल्ली से कल टिकट मार के खिले हैं दाँत ज्यों दाने अनार के आए दिन बहार के ! …

अपने खेत में

अपने खेत में…. जनवरी का प्रथम सप्ताह खुशग़वार दुपहरी धूप में… इत्मीनान से बैठा हूँ….. अपने खेत में हल चला रहा हूँ इन दिनों बुआई चल रही है इर्द-गिर्द …

अन्न पचीसी के दोहे

सीधे-सादे शब्द हैं, भाव बडे ही गूढ़ अन्न-पचीसी घोख ले, अर्थ जान ले मूढ़ कबिरा खड़ा बाज़ार में, लिया लुकाठी हाथ बन्दा क्या घबरायेगा, जनता देगी साथ छीन सके …