Category: कौशलेंद्र प्रपन्न

तुम्हारे समंदर को मीठा बना दूं

तुम्हारे समंदर को मीठा बना दूं घोल कर प्रीत की ढली उलीच डालूं तुम्हारे खारेपन, भर दूं आकंठ मुहब्बत की तासीर तुम्हारे खालीपन में बो दूं दूब संगी की …

तेरे शहर से

उम्मीदों भरे तेरे शहर से नाउम्मीदों की पेाटली बांधे निकल पड़ा उस पार खेत यहीं रह गए रह गई तेरी उम्मीदों के स्वर बस मैं चलता हूं तेरे उम्मीदों …

बस ज़रा प्यास से

किसी दिन जिंदगी का लैपटाॅप यूं ही खुला रह गया और मैं चला गया दूर कहीं किसी भूगोल में सोचो कैसे खोल पाओगे मेरी जिंदगी का लैपटाॅप सारा का …

अच्छा ही हुआ तुम मर गए

अच्छा हुआ अच्छा ही हुआ तुम मर गए समय रहते, तुम वैसे भी जिंदा रह कर जी न पाते। जब देखना पड़ता हजारों बच्चों की मौत, इन्हीं आंखों से …

कविता कहानी से क्या होगा हासिल

रोज दिन हर पल नई नई कविताएं लिखी जा रही हैं। विश्व की तमाम भाषाओं में कविता लिखी जा रही है। जिस रफ्तार से कविताएं लिखी जा रही हैं …

जब हमी नहीं होंगे तो किससे लड़ोगे

जब हमी नहीं होंगे जब हमी नहीं होंगे तो किससे लड़ोगे, हर सुबह, चाय से लेकर नहाने तक, आॅफिस पहंुच कर किससे करोगे शिकायत, कि दुध क्यों नहीं पीया …

सरयू की याद में खासकर 6 दिसंबर पर

सरयू की याद में खासकर 6 दिसंबर पर आस्था का मलबा विश्वास को ढाह कर चैन की नींद ली सरयू को किया लाल और जयजयकार किया हमने। बरसों की …

हम भी हैं कतार में

जिसे देखो वही कतार में खड़ा अपनी पारी का करता इंतज़ार रहा, उम्र गुज़र गई, आस वहीं की वहीं लटकी रही। हवा भी इतज़ार में मकान कुछ नीचे हों …

ख़तरनाक !

डांट नहीं, प्यार भी नहीं, मनुहार भी नहीं, वार भी नहीं। ख़तरनाक- लटका हुआ लोर, अटकी हुई बहस, टंगी हुई सांस टूटता विश्वास। ख़तरनाक- मां का रोना, बहन की …

देवता घर

दीपावली की शुभकामनाएं। परिवार में समृद्धि और खुशियां बनी रहे इसी कामना के साथ एक छोटी सी अभिव्यक्ति प्रस्तुत है। इस बरस देवता घर नहीं खुला, नहीं जोरा दीया, …

चांद परेशां क्यों

चांद परेशां क्यों क्यों हो चांद परेशां, तन्हा भी हो क्यों, रात रात भर अकेले आंसू बहते हो। सुबह दिखती हैं ओसों में, निशा बुलाती है बड़ी दीदी सुनाती …

कब मरेंगे पिताजी

कब मरेंगे पिताजी मां तुम कब मरोगी मां कब मरेंगे पिताजी, जब भी मां मरोगी पिताजी की मिट्टी होगी जब ठंढ़ी, वह शाम होगी, या रात काली, सोचता हूं …

घर में नहीं है रोआन घर

हर घर की तरह- घर में है स्नान घर, रसोई घर, बरामदा और आंगन। देवता घर में मौजूद हैं सारे देवी देवता, रोज बाबा पूजते हैं उन्हें, शाम में …

किताबें रिटायर नहीं होतीं-

हमारे बीच से किसी दिन यूं ही गुम हो जाती हैं, इनके हर शब्द हमारे सामने पुकारती हैं, पढ़ो तो जी, ज़रा सुन तो लो, लेकिन हम बहरे की …

अश्वत्थामा बन भटकता हूं-

अश्वत्थामा बन भटकता हूं- माथे पर लेकर उनके आरोपों का घाव- घूम रहा हूं, यहां वहां, जहां भी जाता हूं, माथे से रीसता वह घाव, याद दिलाता है, उन …

झेलम तुम न बदली-

न बदली चेनाब, कोहाट भी वहीं का वहीं खड़ा, तक्षशीला ताने गर्दन, गवाह हैं सब के सब, संग की खिलंदड़ी का। झेलम तुम क्योंकर खींचती हो अपनी ओर- तेरी …

जिंदगी के छंद

कविता व उपन्यास होती जिंदगी- तो लगा लेते, अनुप्रास, उपमा, श्लेष। गढ़ लेते अपने पसंद के कोई और छंद। मालिनी, शिखरणी, या वज्रतिलक, लगा लेत बना लेते, जीवन के …

मेरे हम उम्र उसपार के दोस्त-

मेरे हम उम्र उसपार के दोस्त- कोफ्त नहीं होता, जब कोई , इल्म के नाम पर, लेता है तालीम भारत विरोधी दस्ते में शामिल होने को, या निकलता है …