Category: जगदीश गुप्त

घाटी की चिन्ता

सरिता जल में पैर डाल कर आँखें मूंदे, शीश झुकाए सोच रही है कब से बादल ओढ़े घाटी।  कितने तीखे अनुतापों को आघातों को सहते-सहते जाने कैसे असह दर्द …

अपराध की इबारत

अपराध यूँ ही नहीं बढ़ता है हर बच्चा बूढ़ों की आँखों में अपराध की इबारत साफ़-साफ़ पढ़ता है। वह इबारत पानी की तरह सतह पर हमें अपना चेहरा दिखती …