Category: गिरीराज किराडू

सुंदर भी वैसे ही नष्ट करता है

शिराओं पे तीखी धार जगाती है ख़ून में उन्माद आँखें मूंदता हूँ और अब यह मेरे मरने के बाद की पृथ्वी है उतनी ही सुंदर उतनी ही असुंदर यह …

सब कुछ होना…रहेगा

छत पर अनिष्ट टहल रहा है ढीठ, बेशर्म कमरे में मुझे करना है अपना शल्य इस मुहूर्त के तीखे चाकू से मुझ पर नज़र रखने वाले क़ातिल तैनात हैं …

यूँ मैंने झूठ कहना शुरू किया

यूँ मैंने झूठ कहना शुरू किया दिसम्बर की एक सुबह तुमने कोहरे में आकाश की ओर उछाल भरी और मेरे सितारे गर्दिश में आने की शुरुआत हुई उसी दिन …

सारी दुनिया रंगा

जूते न हुई यात्राओं की कामना में चंचल हो उठते थे हमने उन पर बरसों से पॉलिश नहीं की थी धरती न हुई बारिशों की प्रतीक्षा में झुलसती थी …

इस पूरी संरचना से बाहर

हमने उन्हें आकाश में ठीक हमारे सिर पर मंडराते देखा था। जैसे पृथ्वी पर घूमने वाला नेपाली एक महीने में एक बार दस रुपये लेने आता है वैसे ही …

टूटी हुई बिखरी हुई पढ़ाते हुए

एक प्रतिनियुक्ति विशेषज्ञ की हैसियत से (मानो उनके कवियों का कवि जाने को चरितार्थ करते हुए) लगभग तीस देहाती लड़कियों के सम्मुख होते ही लगा शमशेर जितना अजनबी कोई …

रिल्के पर एक बढ़त

और ठीक इसी छवि में मैंने तुम्हे पाया है सदैव–आईने के भीतर, बहुत भीतर जहाँ तुम स्वयं को रखती हो–इस संसार से दूर, बहुत दूर फ़िर क्यूँ आई हो …

घर-गिरस्ती

आइए, आपका सबसे तआरूफ़ करा दूँ । ये हमारी चप्पले हैं । इन्होंने चुपचाप चलते रहने के ज़दीद तौर-तरीकों पर नायाब तज़ुर्बे किए हैं । इनसे आप शायद पहले …

पक्षीविदों का कहना है

पक्षीविदों का कहना है यहाँ चौवन तरह के परिंदों ने अपना घर बसा लिया है । सब बड़े मज़े से रहते हैं कबूतरों को घास पर सोते हुए सिर्फ …

क्या-क्या होना बचा रहेगा

आप शायद जानते हों कि मैं आपके सामने वाले घर में रहती हूँ । आपने अक्सर हमें झगड़ते हुए सुना होगा । हमें आपके घर की शांति इतनी जानलेवा …

सुखांत

तुम यही करोगे अंत में मुझे दंड ख़ुद को पुरस्कार दोगे किंतु तुम्हारा किया यह अंत सिर्फ़ एक विरामचिन्ह है दिशासूचक केवल मील का पत्थर अनाथ ! इसी मार्ग पर …