Category: धर्मेन्द्र कुमार निवातियाँ

तुम बहुत याद आते हो – डी के निवातिया

तुम बहुत याद आते हो, तुम बहुत याद आते हो,क्यों इतना सताते हो जीने देते,न मरने देते हो क्यो इतना रुलाते !! जब से तुम चले गए दुनिया हमसे …

मदारी या फ़रेबी – डी के निवातिया

मदारी या फ़रेबी *** मदारी हर दफ़ा कोई नया खेला रचाता है फँसाकर जाल में अपने हमें बुद्धू बनाता है सुई की छेद में हाथी घुसाता है सुना हूँ …

कोई  गोरी  ऐसी  मिले – डी के निवातिया

(ताटंक छंद आधारि) कोई  गोरी  ऐसी  मिले *** कोई  गोरी  ऐसी  मिले  जो, मेरे  दिल  की  रानी हो चतुर चपल चंचल हो चितवन, सुंदरता की नानी हो, देव लोक …

हुई महंगी मुबारकबाद -डी के निवातिया

हुई महंगी मुबारकबाद *** हुई महंगी बहुत ही मुबारकबाद, के सोच समझ कर दिया करो, देना हो जरूरी,तो रखना हिसाब, हर घड़ी हर शख्स को न दिया करो..!! कुछ …

आदमी है, खाता है – डी के निवातिया

आदमी है, खाता है, *********** आदमी है, खाता है, खाकर भी गुर्राता है, करता है खूब चोरी साथ में सीना जोरी कर के गर्व से चौड़ी छाती लाल पीली …

रिश्ते – डी के निवातिया

रिश्ते *** *** रिश्ते वही मगर, रिश्तो में रिश्तो की वो बात नहीं है, सम्बन्ध वही, मगर सम्बन्धो में ज़ज्बात नहीं है, घर में बैठे, चार प्राणी अपनी गर्दन …

तू कैसा प्रेमी है – डी के निवातिया

तू कैसा प्रेमी है !! *** देता है न माँगता सोता न जागता न रोता न हँसता भागता न थकता देखता न तकता, बोलता न बकता, सभी को लगता …

कैसा ये सावन आया – डी के निवातिया

  कैसा ये सावन आया, मुझको अबकी ना भाया, बारिश की इन बूंदों ने जी भर मुझको तड़पाया ।। बागों में कोयल बोले, कानो में मिश्री घोले, अमवा की …

सावन – डी के निवातिया

सावन *** *** *** सिंधु उर से उठ चले, भरकर अंजुरी जलधर, पवन वेग संग थे बढे, सलिल गागर उर धर !! असंतुलित आकार लिए गगन गाँव चले अंबुधर, …

सरकारें – डी के निवातिया

सरकारें ! सरकारों में पंगे है या पंगो की सरकारें है सरकारों में गुंडे है या गुंडों की सरकारें है हकीकत से हमेशा मुहँ छुपाते है ये लोग, सरकारों …

दे देना हमको माफ़ी – डी के निवातिया

मैं पतझड़ की पाती, तुम हो उपवन का फूल ! दे देना हमको माफ़ी, जो हो जाए हमसे भूल !! मै गाँव का देशी छोरा तुम ठहरी शहरी मेम, …

चमक कम न हो – डी के निवातिया

चमक कम न हो *** चाँद से रोशन चेहरे की चमक कम न हो, झील सी गहरी ये आँखे कभी नम न हो, बहारों की फिज़ाओ में दमकता ये …

कुण्डलिया छंद – डी के निवातिया

कुण्डलिया छंद *** मात  दात्री जन्म की , पिता जीव आधार। धरा  गगन के  मेल से, अदभुत  ये संसार।। अदभुत ये संसार, गजब कुदरत की माया। पल में बदले …

#उठा_न_पाते_पत्थर_तुम 

#उठा_न_पाते_पत्थर_तुम   —————————- काश न होता हाथ तुम्हारे । उठा न पाते पत्थर तुम ।। काश न होता इतनी नफरत , उठा न पाते पत्थर तुम। नफ़रत की आग में …

 एक कदम घर की ओर  ———————-

 एक कदम घर की ओर  ———————- कदम बढ़ा रहा था , जाने क्यूं ओ घर की ओर । था पता उसे, नहीं है कुछ खाने को वहां, फिर भी …

 जिसने देश का मान बढ़ाया

 जिसने देश का मान बढ़ाया            ———————————–  जिसने देश का मान बढ़ायाजीता मेडल नाम कमाया । सुन ली गर्जन वीर शेरनी की ।क्रोधित शेरनी ने …

 कोरोना का कहर  —————–

 कोरोना का कहर  —————– कैसा है ये महामारी का डर ।कैसा हैं ये कोरोना का डर ।। थम सी गई है जिंदगी सबकी ।रुक सी गई है जिंदगी सबकी …

मानव जात – डी के निवातिया

मानव जातचींटी से भी है कमतेरी औक़ात ।।दिल का छोटा,आदम की औलाद,कर्म का खोटा ।।काज न भाये,मुफ्तखोर शैतान,बाज़ न आये ।।नीच इंसान,राम राम भजतेबना हैवान ।।कर्म से गन्दा,मानवता की …

अपने ही घर में बेगाना हूँ – डी के निवातिया

अपने ही घर में बेगाना हूँ,हालत पर अपनी बेचारा हूँ ।।मैं सबका सब मेरे है फिर भी,अपनों के बीच अनजाना हूँ,।।कहने को है सारा शहर मेरामुर्दो की भीड़ में …

जब से हम कांटो को, गले से लगाने लगे है

  जब से हम कांटो को, गले से लगाने लगे हैलोग फूलो की चुभन से, हमे सताने लगे है !दर्द से रिश्ता कुछ ख़ास-म-खास हुआ हैमर्ज़-ऐ इश्क में खुद सुधार …

माहिया विधा रचना – डी के निवातिया

१.आना मेरे साजन,खुशियों की डोली,लेकर मेरे आँगन !! २.जिस दिन तू आएगा,झूमेगा ये मन,नाचेगा, गाएगा  !! ३.जब मेरी सजे डोली,रात दिवाली कीदिन में होगी होली ।।४.दर्शन को मैं तरसीसावन …

हाइकू मज़दूर- मज़बूर – डी के निवातिया

हाइकू मज़दूर- मज़बूर *** सुदूर गाँवशहर ये बेगानामिले न ठाँव !! प्रवासी चलेनापे ज़मीं आसमांकदमो तलें !! रोज़ी की खोज,पत्थर बने फूल,रुई का बोझ !! गाँव के लोगशहरो पर …

ज़ाम-ऐ-शराब – डी के निवातिया

ज़ाम-ऐ-शराब *** इश्क में हमे न वफ़ा का गुलाब चाहिए,ख़िदमत में न दावत-ऐ-क़बाब चाहिए !हम तो आशिक, मजनूं, दिवाने यार है,उनकी आँखों से ज़ाम-ऐ-शराब चाहिए !! *** स्वरचित – …

माँ – डी के निवातिया

।। माँ ।। मोतियों सा भरा समंदर,लहरों सी उतार-चढ़ाव, माँ, उम्मीदों से भरा शहर जैसे,कोई ठहरी झील सी गाँव, माँ, शुभकामनाओं की लड़ी,आशीषों की बड़ी छाँव, माँ, सूरज माथे …