Category: सी. एम. शर्मा

#उठा_न_पाते_पत्थर_तुम 

#उठा_न_पाते_पत्थर_तुम   —————————- काश न होता हाथ तुम्हारे । उठा न पाते पत्थर तुम ।। काश न होता इतनी नफरत , उठा न पाते पत्थर तुम। नफ़रत की आग में …

 एक कदम घर की ओर  ———————-

 एक कदम घर की ओर  ———————- कदम बढ़ा रहा था , जाने क्यूं ओ घर की ओर । था पता उसे, नहीं है कुछ खाने को वहां, फिर भी …

 जिसने देश का मान बढ़ाया

 जिसने देश का मान बढ़ाया            ———————————–  जिसने देश का मान बढ़ायाजीता मेडल नाम कमाया । सुन ली गर्जन वीर शेरनी की ।क्रोधित शेरनी ने …

 कोरोना का कहर  —————–

 कोरोना का कहर  —————– कैसा है ये महामारी का डर ।कैसा हैं ये कोरोना का डर ।। थम सी गई है जिंदगी सबकी ।रुक सी गई है जिंदगी सबकी …

ग़ज़ल – ज़िन्दगी और बद्दुआ क्या है….

ज़िन्दगी तुझसे वास्ता क्या है…उम्र भर ढूंढना मेरा क्या है…. न मिला वो तुझे न तू उससे…फिर तुझे गैर सा लगा क्या है…. राख में जिस्म ढल ही जाएगा…फिर …

मन चल तू अब अंत की ओर…

मन चल तू अब अंत की ओर…बस पग एक अनंत की ओर… शान्ति अशांति लोभ क्षोभ…हो मोह या विछोह की डोर….किसकी किसके साथ है भोर…नहीं स्थायी किसी को ठौर…मन …

ग़ज़ल – बिका हूँ रोज़ महब्बत में…

बिका हूँ रोज़ महब्बत में मैं खुदा की तरह…मगर करीब नहीं था कभी दुआ की तरह… नहीं है आग मगर जल रही है जान मेरी….जिगर में याद तेरी अनबुझी …

छंद-दोहा-बजी चैन की बांसुरी…

II छंद – दोहे II लौ व्यापत है एक ही, देखो जिस भी ओर….इधर उधर क्यूँ भागते, भीतर नंदकिशोर… कान्हा कान्हां मैं करूँ, कान्हा नज़र न आय…कभी पकड़ लूँ …

ग़ज़ल – तुम मेरी शाम-ओ-सहर हो…

तुम को हम खुद से छुपाएं तो छुपाएं कैसे…तुम मेरी शाम-ओ-सहर हो तो भुलाएं कैसे…. दिल कहे याद मुझे वो भी तो करता होगा….अब न वो बात सहर रात …

विधा: तज़मीन बर तज़मीन…

(अपनी ही तज़मीन जनाब नक्श लायलपुरी साहिब ग़ज़ल “ये मुलाक़ात इक बहाना है… प्यार का सिलसिला पुराना है” पर)…. प्यार में हर कोई दीवाना है…नींद से जागना जगाना है….चाँद …

ग़ज़ल – कहूँ तो किस से कहूँ…

तुम्हीं सुनो न हकीकत कहूँ तो किस से कहूँ…मैं अपने दिल की तबीयत कहूँ तो किस से कहूँ… तुम्हारे प्यार में ज़िंदा जला मरा न मगर….मेरी थी मुझसे अदावत …

विधा: तज़मीन – ग़ज़ल जनाब नक्श लायलपुरी साहिब … “ये मुलाकात इक बहाना है…”

इश्क़ जन्नत, अदू ज़माना है…इसका सदिओं रहा फ़साना है…रोज़ हर इक नया तराना है…“ये मुलाकात इक बहाना है..प्यार का सिलसिला पुराना है….” भूल कर भी न हम भुला पाएँ…हर …

ग़ज़ल – मेरी उल्फत ज़रा नुरानी थी…

मेरी उल्फत ज़रा नुरानी थी… टूटने की यही कहानी थी…. डूब कर भी न मैं पकड़ पाया….मंज़िले इश्क़ बदगुमानी थी…. होलिका को मुग़ालता ही रहा…आंच उस पर न कोई …

सावन – छंद चौपाई….

II छंद – चौपाई IIकारे कारे बादल आये, मन मेरे को नाच नचाये….मेघा गरजे बिजली चमके, डर कर मेरा मनवा दुबके…देखूं राह मैं चढ़ अटरिया, कब आएंगे पिया नगरिया…घूमूं …

वो शफ़क़ शर्म हया तेरी भुला भी न सकूं…

इश्क़ ज़ंजीर बनी खुद को छुड़ा भी न सकूं….ज़ख्म पैराहन-ए-वफ़ा मैं सिला भी न सकूं….ज़िन्दगी रोज़ मुझे मिल के बिछड़ जाती है…टूटते दिल में बसाऊं क्या बिठा भी न …

जनतंत्र …. फैसला….

क्यूंकि मैं उनको भा गयी थी….फैसला था…घर के सभी लोगों का…मुझे छोड़ कर…शादी ऊंचे घराने में…कर दी मेरी….ऊंची एड़ी के सैंडल…चमकते हुए…बहुत चुभते थे मुझे…बहुत तकलीफ देते थे…सब को …

त्रिवेणी….

विधा: त्रिवेणी….१.बारूद और माचिस की जरूरत नहीं….बन्दूक गोली का भी क्या करना….बस ज़ुबाँ के दो बोल काफी हैं !२.कम बोलना बहुत अच्छा है….बोलने से पहले तोलो…..नेता सब आजाद हैं …

ग़ज़ल – तू जो मुझ में समायी तू ही रह गयी….

मौत कब है बँटी ज़िन्दगी रह गयी….हर किसी में अना की अमी रह गयी…धूप में छाँव के आँचल की तरह…मेरी साँसों में खुशबू तेरी रह गयी….मिट गया हर निशाँ-ओ-वजूद …

कुछ कभी तुम भी भूल जाया करो…

ख़्वाब में आ के मत सताया करो…तुम मुझे यूं न मिलने आया करो…रिश्तों में गैरियत रहेगी नहीं…’हम’ पे ‘तुम’ और ‘मैं’ लुटाया करो….सीख कर मुझसे लफ़्ज़ों के माईने….मेरे लिखे …

पिता….सी.एम्.शर्मा (बब्बू)….

पिता….न जाने किन शब्दों औरभावों का रूप है…संज्ञा है….पिता…कर्ता…अकर्ता…द्रष्टा….अदर्ष्टा….मैं हिन्दू ब्राह्मण हूँ…क्यूंकि मेरे पिता…हिन्दू थे और ब्राह्मण थे…पिता जाति बन गया…धर्म बन गया…पालनहार बन गया…कभी घोडा बन गया…कभी सूर्य …

ग़ज़ल-अश्क अंगार मेरे मुझ से गिराये न बने…

जनाब मिर्ज़ा ग़ालिब साहिब की एक ग़ज़ल है….”नुक्ता-चीं है ग़म-ए-दिल उस को सुनाए न बने… क्या बने बात जहाँ बात बनाए न बने”…. इसी ज़मीन में लिखी ग़ज़ल… कुछ …

पहेली – धूप ठंडी कैसे हो सकती है – सी.एम्.शर्मा (बब्बू)…

ज़िन्दगी इतनी बड़ी पहेली न होती….गर कवि न होता….सीधा न सोचता न सोचने देता….अच्छी भली राहों को ऊबड़ खाबड़ कर देगा…साफ़ पगडंडियों पे कांटे उगा देगा…न जाने दिमाग कैसा …

हाथ से रेत की मानिंद फिसल जाऊँगा…ग़ज़ल…सी.एम्.शर्मा (बब्बू)…

हाथ से रेत की मानिंद फिसल जाऊँगा….मौत का हाथ पकड़ चुपके निकल जाऊँगा….तू अगर साथ दे काँटों में भी खिल जाऊँगा…भोर के तारे सा हर राह में जल जाऊंगा…रात …

ग़ज़ल – साँसों की डोर जितना ही उड़ना हिसाब में…सी.एम्.शर्मा (बब्बू)

हम फंस गए हसीन के हुस्न-ए-सराब में…करती सवाल जिसकी अदाएं जवाब में….उड़ती हुई पतंग ने हम को सिखा दिया…साँसों की डोर जितना ही उड़ना हिसाब में….बेशक चढ़ा लो कोई …