Tag: समाज पर कविता

रौशनी के लिए

रौशनी के लिए ——————सुबह दहलीज में पड़ी अख़बार नहीं हूँ मैंपढ़ती हूँ सुबह -सुबह जल्दी में और शाम को फ़ेंक देते हो रद्दी के साथ कैलेंडर भी नहीं हूँ …

वर बिकता है

मेरे वतन की रीत निराली जहां सड़को पे भगवान बिकता है इन्सनियत का कोई मोल नहीं यहां वस्तुओ की तरह वर बिकता है क्या कहिये सोच मेरे समाज की …