Tag: गंभीर काव्य

जुदा हो जाऊँगा – डी के निवातिया

जुदा हो जाऊँगा *** कोई रोकना चाहेगा लाख फिर भी जुदा हो जाऊँगा लगाकर गले मौत को,  जिंदगी से ख़फ़ा हो जाऊँगा !! चाहकर भी कुछ न कर पायेगा …

रोना याद आया – डी के निवातिया

रोना याद आया *** रोते हुए देखा पड़ोसी को तो रोना याद आया, जब भूख लगी, तब फ़सल बोना याद आया ! सोया था पैर पसार कर, बड़े ही …

जड़ चेतन – डी के निवातिया

जड़ चेतन *** मैं तो जड़ हूँ पर तुम तो चेतन हो, सँवार लो तुम, दे परिचय प्रबुद्धता का, तराश लो मुझे, अपने मन माफिक, कायम कर दो, गूढ़ता …

ज़िन्दगी के काले पन्ने

काली अंधेरी रात, आसमान में कड़कड़ाती हुई बिजली के साथ मूसलाधार बारिश और पेड़ को जड़ से उखाड़ देने वाली आंधी चल रही थी। वरुण घर के बरामदे में …

आदमी है, खाता है – डी के निवातिया

आदमी है, खाता है, *********** आदमी है, खाता है, खाकर भी गुर्राता है, करता है खूब चोरी साथ में सीना जोरी कर के गर्व से चौड़ी छाती लाल पीली …

तू कैसा प्रेमी है – डी के निवातिया

तू कैसा प्रेमी है !! *** देता है न माँगता सोता न जागता न रोता न हँसता भागता न थकता देखता न तकता, बोलता न बकता, सभी को लगता …

लगी जो आग इस ज़माने में ।

लगी जो आग इस ज़माने में वो बुझे कैसे, उठी दीवार ये जो दरमिया गिरे कैसे। दरारे पड़ रही बचपन की मुस्कुराहटों के बीच, बढ़ रहीं दूरियां दिल की, …

मैं क्या हूँ ? { श्रमिक वर्ग की वेदना }

दिखने में तो इंसान हूँ ,मगर क्या वास्तव में इंसान हूँ ?न दिल अपना ,न दिमाग अपना ,जो जिधर कहे वहीं चला जाता हूँ ।कभी गाँव से शहर की …

मज़दूर

कल तक हाथों में जो छाले थे।बो पहुँच गए है पांव तक।मत रोको उनको जाने दो ।उन्हें जाना है अपने गांव तक।सदियों से जिसने शहर सबारे।बो फिरे है धूप …

कैसे और क्या

कैसे और क्या लिखूं कविताकुछ समझ आ नहीं रहाभण्डार खो गया विचारों काये क्या हो गया कुछ सूझ नहीं रहाकुछ बूझ नहीं रहालिखने को उत्सुक हो रहापर विचार बन नहीं …

पायल….सी.एम्.शर्मा (बब्बू)…

पायल….न जाने कितने भावों को जन्म देती है….प्रियतमा के पैरों में….मन के तारों को झंकृत करती है….सांसों में स्वर सजाती है….शब्दों को अलंकृत करती है….रुनझुन रागों को जन्म देती …

सोच-सोच घबराता हूँ

ये सोच-सोच घबराता हूँ…….. *** पिता नही मेरी ताकत है, छत्र-छाया में उनकी रहता हूँमहफूज उनके संरक्षण में, निडर हो बेफिक्री से जीता हूँछोड़ जायेंगे एक दिन अकेला,ख्याल से …

स्वंय से तुम युद्ध करो – डी के निवातिया

स्वंय से तुम युद्ध करोबुद्ध को तुम प्रबुद्ध करोआत्मा को शुद्ध करोचैतन्य सर्व प्रबल होस्वंय से तुम युद्ध करो !!अभीष्‍टता आस करोसत्य का प्रयास करोनिरंकुश चित्त न होदानत्व का …

गीत झूठे खुशहाली के – डी के निवातिया

गीत झूठे खुशहाली के *** ऐ राजनीति झूठे वादों पर मत जा बंद नयनो को ज़रा खोलकर देख !आसमा छूने वाले धरा पर मति ला हकीकत को सच में …

मै भारत माता बोल रही हूँ – डी के निवातिया

मै भारत माता बोल रही हूँ *** जंजीरों में जकड़ी हूँमै भारत माता बोल रही हूँह्रदय में उठती पीड़ाचन्द शब्दों में खोल रही हूँ ।। कोई बन गया पैसे …

बोझ….सी.एम्. शर्मा (बब्बू)….

मन, काल कोठरी में बंद…दीवारों से टकराता है…गहरे डूब जाता है…कभी…ठक ठक सुनायी देती है…धीमें से दबे पाँव…चलता हो जैसे कोई…या डूबने वाला….रुक रुक के सांस लेता है…समय निकल …