Tag: गंभीर काव्य

बिन भाई की बहन राखी गीत – डी के निवातिया 

बिन भाई की बहन राखी गीत भाई नहीं है जिसका उससे राखी कौन बंधाये बिन भाई की जो बहना हो कैसे फर्ज निभाये, अगर नहीं है भाई मेरा, उसमे …

वो आईना लेके मुस्कुराते रहे।

वो लेके आइना मुस्कुराते रहें हवाओं में थे एहसास सो आते जाते रहें आईने से ही न जाने क्यों इतना शरमाते रहें हर राज दिखा कर भी छिपाते रहें …

किस किताब के शब्द हो तुम।

किस किताब के शब्द हो तुम जो इतने दिनों से समझी नहीं जितना खोऊं उतना उलझुं ठिकाने की कोई कमती नहीं आंखों से देखा बेहद सरल समझने बैठी थी …

एक बेटी का पिता से छोटा सा अनुरोध लेखक अभिमन्यु कुमार स्याल, Abhimanyu Kumar Siyal

पापा पराई नहीं होती है बेटियां थोड़ा खुद को समझा लो न,तुम्हें भगवान मानती हूं मैं मुझे भक्त समझ अपनालो न।……2 भाई की छोटी सी उपलब्धि पर भी प्यार …

जुदा हो जाऊँगा – डी के निवातिया

जुदा हो जाऊँगा *** कोई रोकना चाहेगा लाख फिर भी जुदा हो जाऊँगा लगाकर गले मौत को,  जिंदगी से ख़फ़ा हो जाऊँगा !! चाहकर भी कुछ न कर पायेगा …

रोना याद आया – डी के निवातिया

रोना याद आया *** रोते हुए देखा पड़ोसी को तो रोना याद आया, जब भूख लगी, तब फ़सल बोना याद आया ! सोया था पैर पसार कर, बड़े ही …

जड़ चेतन – डी के निवातिया

जड़ चेतन *** मैं तो जड़ हूँ पर तुम तो चेतन हो, सँवार लो तुम, दे परिचय प्रबुद्धता का, तराश लो मुझे, अपने मन माफिक, कायम कर दो, गूढ़ता …

ज़िन्दगी के काले पन्ने

काली अंधेरी रात, आसमान में कड़कड़ाती हुई बिजली के साथ मूसलाधार बारिश और पेड़ को जड़ से उखाड़ देने वाली आंधी चल रही थी। वरुण घर के बरामदे में …

आदमी है, खाता है – डी के निवातिया

आदमी है, खाता है, *********** आदमी है, खाता है, खाकर भी गुर्राता है, करता है खूब चोरी साथ में सीना जोरी कर के गर्व से चौड़ी छाती लाल पीली …

तू कैसा प्रेमी है – डी के निवातिया

तू कैसा प्रेमी है !! *** देता है न माँगता सोता न जागता न रोता न हँसता भागता न थकता देखता न तकता, बोलता न बकता, सभी को लगता …

लगी जो आग इस ज़माने में ।

लगी जो आग इस ज़माने में वो बुझे कैसे, उठी दीवार ये जो दरमिया गिरे कैसे। दरारे पड़ रही बचपन की मुस्कुराहटों के बीच, बढ़ रहीं दूरियां दिल की, …

मैं क्या हूँ ? { श्रमिक वर्ग की वेदना }

दिखने में तो इंसान हूँ ,मगर क्या वास्तव में इंसान हूँ ?न दिल अपना ,न दिमाग अपना ,जो जिधर कहे वहीं चला जाता हूँ ।कभी गाँव से शहर की …

मज़दूर

कल तक हाथों में जो छाले थे।बो पहुँच गए है पांव तक।मत रोको उनको जाने दो ।उन्हें जाना है अपने गांव तक।सदियों से जिसने शहर सबारे।बो फिरे है धूप …