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मेरे ख्वाब कभी जो पास तुम्हारे आते- आशीष अवस्थी

मेरे ख्वाब कभी जो पास तुम्हारे आते चुपके से उनको तुम अपने पास सुलाते धूप शहर की तेज बहोत थी फिर भी हम बच जाते गर तुम गगरी में …

जमाना भूल जाता हूँ।

जब भी तुम्हारी चाहत में मै हद से ज्यादा   डूब जाता हूं।कोई  नयी पंक्ति की धुन  को जब जब भी  तुम्हे सुनाता हूँ।जब भी तुम सुनते-सुनते  हँस कर चुप …

ये तय है कि बिन तुम्हारे में जी नही सकता।

तुम्हारे ख्यालातों की डोर मैं तुमको दे नही सकता।नाराज हो कर भी मै नाराज तुमसे हो नही सकता।ये दूरी की साजिश है जो तुम हमसे रूठते हो ,ये तय …