Tag: राजनैतिक कविता

संसद चलाते हो या मुंगसीपालटीराज?

कानुन का राज है या उपदेश का राज सच क्या है बताओ मै पुछता हुँ आज झाडू लगाते हो करते नदी नाले साफ संसद चलाते हो या मुंगसीपालटीराज विधी …

दिल्ली में जाके मरते है लोग.!

चूल्लभर पाणी भरते है लोग दिल्ली में जाके मरते है लोग एक अदना सा ख्वाब देखते और भला क्या करते है लोग टिचर, साइंटिस्ट राष्ट्रपती बन जाते राजनिती को …

गज़ल- मगरूर हो गए हैं

मगरूर हो गए हैं, नशे में चूर हो गए हैं इंसान होकर इन्सानियत से दूर हो गए हैं अस्मते माँ -बहनो की, जाती है क्यूँ इसकदर सवालिया निशान सब …

राजनीति को इस धरती से, दफा कर दो

है नहीं, हो रहा है इंसान लाशे ढो रहा है हांक रहे हैं धर्मो- मजहब के ठेकेदार सत्ता के लिए सब हो रहा है एक जरुरी काम है बस …

नेता

नेता खुश हैं मित्र चकित भी, कैसा एक नेता दमखम वाला निकला, देश के उत्थान के लिए, वह लड़ेगा, देश बढ़ेगा, क्योंकि लड़ाइयों से ही बढ़े हैं देश उन्हें …

कोई बंटी समझता है, कोई बबली समझता है।

कोई बंटी समझता है, कोई बबली समझता है। मगर कुर्सी की बैचेनी को, बस “कजरी” समझता है। – मैं कुर्सी से दूर कैसा हूँ, मुझसे कुर्सी दूर कैसी है …

दो पल का जीवन माँग रहे हैं…

वचन दिया था गीता में ‘मैं आऊंगा’, पर तू होता नहीं अवतीर्ण है यहाँ आज जब मानवता के प्रासाद हो रहे जीर्ण शीर्ण हैं| मनुष्य नहीं दिखते यहाँ ,यद्यपि …

वन्दे मातरम् – राष्ट्र गीत

वन्दे मातरम्। सुजलां सुफलां मलय़जशीतलाम्, शस्यश्यामलां मातरम्। वन्दे मातरम् ।।१।। शुभ्रज्योत्स्ना पुलकितयामिनीम्, फुल्लकुसुमित द्रुमदलशोभिनीम्, सुहासिनीं सुमधुरभाषिणीम्, सुखदां वरदां मातरम् । वन्दे मातरम् ।।२।। कोटि-कोटि कण्ठ कल-कल निनाद कराले, कोटि-कोटि …

ये आलिमां भी बहायेंगे आब-ए-तल्ख़,

ये आलिमां भी बहायेंगे आब-ए-तल्ख़,   कैसे कैसों को दिया है, इंसान होकर सांप से डसते रहे, उन्हें भी दिया है, इस बार क्यों न सांप से ही डसवा …

देश को दो अब नया विकल्प

  लिखो नई पटकथा देश की रचो नया इतिहास ! गांव- गांव में नगर-नगर में फैले नया उजास !! ॠद्धि- सिद्धि -संॠद्धि देश से है अब कोसों दूर , अमन-चैन …

संभावित कदम

मंहगाई रोकने के लिए हर संभव कदम उठायेगी सरकार वित्तमंत्री सोच समझकर कहते हैं। सुरक्षा के सभी उपाय किये जायेंगे आंतरिक और बाह्‌य सुरक्षा सभी पर सरकार की कड़ी …

मानचित्र पर सबकुछ अच्छे

रोते और विलखते बच्चे  उनके सारे दाबे  कच्चे !   नहीं पेट में हैं जब दाने   बच्चे घर से चले कमाने  मजबूरी में पाते गच्चे ! रोते और विलखते  बच्चे !! कचडों में साधन तलाशते  विद्यालय के बन्द  रास्ते  बैठक पर बैठक औ चर्चे ! उनके सारे दाबे  कच्चे !! भूख इन्हें मुह रोज  चिढाती , रोटी  पग-पग पर  ललचाती .  खिचडी पर खर्चे ही  खर्चे !  रोते और विलखते  बच्चे !! जाडे में पाले से मरते  …

चतुर मदारी

घूम -घूमकर चतुर मदारी दिखा रहा  चहूओर तमाशा ! नाला -नलिया सडक- सडकिया कही-कही पर पुल औ पुलिया गढढे मे चल रही सबारी पब्लिक झासा ही झासा ! मेलों में पुस्तकें सजीं हैं …