Tag: प्रकृति पर कविता

बस नही तो वो “ज़िंदगी”

वही छत वही बिस्तर..! वही अपने सारे हैं……!! चाँद भी वही तारे भी वही..! वही आसमाँ के नज़ारे हैं…!! बस नही तो वो “ज़िंदगी”..! जो “बचपन” मे जिया करते …

अस्र्णोदय की बेला………..

नव उमंग, नव तरंग, नव उषा किरण छायी योवन रूप लेकर, अस्र्णोदय की बेला आई !! अश्वारोही हो दिनकर चला नभ मंडल में लालिमा छाई मुख मंडल पर दमकी …

काँप उठी…..धरती माता की कोख !!

कलयुग में अपराध का बढ़ा अब इतना प्रकोप आज फिर से काँप उठी देखो धरती माता की कोख !! समय समय पर प्रकृति देती रही कोई न कोई चोट …

मेरा भारत देश महान…… !!

मित्रो, यह कविता मैंने कुछ समय पहले लिखी थी जिसे आज आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ, समस्त कवि मित्रो से निवेदन है की अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दे !! …

सवेरा …..

सूरज निकला, हुआ सवेरा पंछियो ने भी लगाया बसेरा सुगन्धित पवन मंद मंद बहे मौसम ने ख़ुशी का रंग बिखेरा !! सिमट गया अब रात का पहरा छुप गया …

सावन की घटा…..

सावन की घटा लहरके बरसी आज अरसे के बाद !! सोंधी मिटटी की खुसबू महकी आज अरसे के बाद !! मेघ गाते मल्हार नभ में आज अरसे के बाद …

तुमने सोचा है कभी ……. (कविता)

तुमने सोचा है कभी ……. (कविता) हे मानव ! तुमने सोचा है कभी , तुम पूर्णत: हो नारी पर निर्भर . जन्म से मृत्यु तक तुम्हारे जीवन- सञ्चालन में …

कुछ अनसुलझे प्रश्न……… (कविता)

कुछ अनसुलझे प्रश्न……… (कविता) जब मात्र-सतात्मक है समस्त सृष्टि , धरती है माता ,प्रकृति है माता , गंगा मईया व् समस्त नदियाँ , वोह भी हैं अपनी मातायें, गौ …

एक पत्र ईश्वर के नाम (कविता)

एक पत्र ईश्वर के नाम (कविता) हे प्रभु !कहो तुम्हारा क्या हाल है , तुम कहाँ हो ? हम हो रहे बेहाल हैं. कहो तुम्हारे बैकुंठ का मौसम है …

कहर…………..

रह रहकर टूटता रब का कहर खंडहरों में तब्दील होते शहर सिहर उठता है बदन देख आतंक की लहर आघात से पहली उबरे नहीं तभी होता प्रहार ठहर ठहर …