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मानव सब मेरे ही अपने

मानवजग में जितने हैंसब मेरे ही अपने हैं;सोच भले हो अलग-अलग सबके अपने काम-काज़ हैंसबके अपने सपने हैं।काफिर या मुनाफिक किसी को क्यों कह दूं मैं,ये बात भला कैसे …