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आदमी है, खाता है – डी के निवातिया

आदमी है, खाता है, *********** आदमी है, खाता है, खाकर भी गुर्राता है, करता है खूब चोरी साथ में सीना जोरी कर के गर्व से चौड़ी छाती लाल पीली …

रिश्ते – डी के निवातिया

रिश्ते *** *** रिश्ते वही मगर, रिश्तो में रिश्तो की वो बात नहीं है, सम्बन्ध वही, मगर सम्बन्धो में ज़ज्बात नहीं है, घर में बैठे, चार प्राणी अपनी गर्दन …

लगी जो आग इस ज़माने में ।

लगी जो आग इस ज़माने में वो बुझे कैसे, उठी दीवार ये जो दरमिया गिरे कैसे। दरारे पड़ रही बचपन की मुस्कुराहटों के बीच,बढ़ रहीं दूरियां दिल की, ये …

मैं क्या हूँ ? { श्रमिक वर्ग की वेदना }

दिखने में तो इंसान हूँ ,मगर क्या वास्तव में इंसान हूँ ?न दिल अपना ,न दिमाग अपना ,जो जिधर कहे वहीं चला जाता हूँ ।कभी गाँव से शहर की …

सूरज की किस्मत – शिशिर मधुकर

तूफान आते रहेंगे जीवन भी चलता रहेगा मिले ना मिले तू मुझे पर प्यार अपना पलता रहेगा ठोकर लगे ना तो जीवन में कोई दर्द को ना जाने गिरता …

कुछ सवाल ज़िंदगी से ….. (गजल)

यह क्या रोग लगाया है खुद को ए ज़िंदगी !,जिंदगी से कहीं पीछे छुट गयी तू ज़िंदगी ।कितनी हसरतें थी तेरी,और कितनी चाहते ,वो सब तुझसे क्यों रूठ गयी …

खुराफात हो जाए – डी के निवातिया

खुराफात हो जाए *** शैतानों की भीड़ में अगर इंसान से मुलाक़ात हो जाए,मैं समझू, की मेरी ईश्वर , अल्लाह से बात हो जाए !! झूठों के नगर में …

पिता….सी.एम्.शर्मा (बब्बू)….

पिता….न जाने किन शब्दों औरभावों का रूप है…संज्ञा है….पिता…कर्ता…अकर्ता…द्रष्टा….अदर्ष्टा….मैं हिन्दू ब्राह्मण हूँ…क्यूंकि मेरे पिता…हिन्दू थे और ब्राह्मण थे…पिता जाति बन गया…धर्म बन गया…पालनहार बन गया…कभी घोडा बन गया…कभी सूर्य …

चेहरे के पीछे चेहरा – अनु महेश्वरी

चाहती हूँ समय को,अपनी मुट्ठी में कैद करलूँ,लोगो से बेपरवाह हो,ताजी हवा सासों में भरलूं।पर रोके किसी केसमय कब रुका है भला,यह मस्त अपने में,सबकुछ अतीत कर चला।फिक्र नहीं …

प्रेरणा….सी.एम्.शर्मा (बब्बू)…..

नाहक डरते हो तुम…..दुःख से कभी सुख से….कभी रौशनी से मुंह फेर लेते हो…कभी अँधेरे से घबराते हो….जान कर भी तुम…अपने को नहीं पहचानते….मैं हर पल तुम्हें उद्वेलित करती …

कल्पना – डी के निवातिया

आऒ जानें ….कल्पना क्या है ……….!!***प्रत्यक्षानात्मक अनुभवों की ये कुँजी हैबिंबों और सृजन विचारों की ये पूँजी हैविचारणात्मक स्तर की रचनात्मकता’कल्पना’ नियोजन पक्ष की है रोचकता !!दिवास्वप्न व मानसिक …

भाग्य ना कोई बांच सका है – शिशिर मधुकर

वक्त की ज़द में कुछ भी हो तुम फिर भी रहना पड़ता हैतेरे बिन इस तन्हाई का ग़म मुझको भी सहना पड़ता हैकितना भी कोई संयम रख ले दर्द …

आसक्ति – शिशिर मधुकर

राधा से पूरा प्रेम किया फिर मथुरा को निकल गएप्रेम की इस आसक्ति से तो केवल प्रेम ही बच पाया योगीराज ने कर्मयोग की शिक्षा संसार को दे डालीइसीलिए …

तू ही जग का पालन हार – अनु महेश्वरी

कान्हा कर सब पे उपकार,तू ही जग का पालन हार।इंसान तेरी ये माया,कभी समझ न पाया,हमे जो भी मिल रहा है,तेरे सहारे ही चल रहा है,फिर इंसान क्यो है …

सृजन 1….सी.एम्.शर्मा (बब्बू) ….

सृजन करने निकला था….अपनी दुनियाँ का मैं….खुद को ग़ुम सा पाता हूँ….मैं खुद को पाना चाहता हूँ….हर कोई जानता है मुझे…पर मैं भूल जाता हूँ…कब अपनों में गैरों से…कब …

विनाशकारी कलयुग ( कविता)

कलयुग का यह विनाशकारी रूप ,हमारा भाग्य हमें दिखा रहा .विकास का चेहरा दिखाते हुए ,इसका कदम तो पतन की ओर बढ़ रहा .ज्ञानियों से सूना था इसका बखान …

खुदा का है दरबार – अनु महेश्वरी

 जग में हम सभी किरायेदार,दुनिया खुदा की है दरबार,अस्थायी है अपना निवास,बाकी बातें सभी निराधार|सभी को जाना है एकबार,मन में क्यों रखे फिर भार,ख़तम कर दिलों का मतभेद,अब न लड़े …

मौन बड़ा अनमोल – डी के निवातिया

मौन बड़ा अनमोल***मौन बड़ा अनमोल प्यारे, नही इसका कोई मोलमौन के आगे सब हारे, बोलो कितने कड़वे बोल !!मौन जब तक मौन है, दुनिया में निडर होकर डोलजिस दिन …