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ग़ज़ल – बिका हूँ रोज़ महब्बत में…

बिका हूँ रोज़ महब्बत में मैं खुदा की तरह…मगर करीब नहीं था कभी दुआ की तरह… नहीं है आग मगर जल रही है जान मेरी….जिगर में याद तेरी अनबुझी …