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वज़ह — डी के निवातिया

वज़ह *** बिना वज़ह ये सुबह शाम नहीं होतीहर एक शै: जग में आम नहीं होती !जी लो हर एक पल को फिर हो न होजिंदगी किसी की गुलाम …