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बेगैरत

आबरू मेरी चाहतों कीरोज ही लुटती हैतमन्नाओं के तकिये परसपने रोज सिसकते हैं |मुक़द्दस्त मालिक हो गयादेखो ये जहां मेरामुझे उधर घूमाते हैं जिधरअच्छा समझते हैं |चीखें भी मेरी …