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बेइमान बहुत है—–(डी.के. निवातियाँ )

लोग शहर के अनजान,एक दूजे से हैरान बहुत है !देखकर हालात इंसानियत के, दिल परेशान बहुत है !!बिकता है देखो मजहब आज आतंक के इस बाजार में !मगर धर्म …