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तेरे काबिल

इस तन्हा जंगल मेंमहुऐ सा खिलता हूँ मैंअक्स से तुम्हारे बनी घाटीरोज आकर मिलता हूँ मैंकहीं तो मिले ठिकानाकोहरे बिखरता हूँ मैंआँखों में ढूढ़ता मंजिलमीलों रोज निकलता हूँ मैंबनाने …