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किरीट सवैया

(किरीट सवैया) भीतर मत्सर लोभ भरे पर, बाहर तू तन खूब सजावत। अंतर में मद मोह बसा कर, क्यों फिर स्वांग रचाय दिखावत। दीन दुखी पर भाव दया नहिँ, आरत हो भगवान मनावत। पाप घड़ा उर माँहि भरा रख, पागल अंतरयामि रिझावत।। ×××××× *किरीट सवैया* विधान यह 8 भगण (211) प्रति पद का वर्णिक छंद है। हर सवैया छंद की …