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अल्हड़ बेगाना—डी. के. निवातिया

न जगाओ मेरे जमीर को, मुझे नासमझ नादाँ ही रहने दो !मैं ठहरा अल्हड़ बेगाना, जो कहे ज़माना बेशक कहने दो !!!इंसानियत का मोल नहीयंहा जिस्मो की तिज़ारत होती …