Author: विनय कुमार

चालाकी से उसका सपना तोड़ दिया

चालाकी से उसका सपना तोड़ दिया मैंनें इन हाथों का कासा तोड़ दिया पागल था मैं पीली रंगत वालों का सरसों जब फूली तो पत्ता तोड़ दिया पहले सारे …

ख़ामोश रहा जा सकता है

यह कटा हुआ जंगल नहीं जला हुआ शहर है इसके बारे में कुछ नहीं कह सकते पर्यावरणविद। इस चुप्पी के लिये बहुत सारे तर्क हैं इनके पास। जैसे कि …

कुछ भी कर सकता हूँ मैं लौट जाने के सिवा

कुछ भी कर सकता हूँ मैं लौट के जाने के सिवा कोई चारा नहीं दिल उसका दुखाने के सिवा कब चिरागों से कोई काम लिया जायेगा क्या किया आपने …

कुछ नई आवाज़ें पुराने कब्रिस्तान से

मक्खी की तरह पड़ी है आपकी चाय की प्याली में हमारी वफ़ादारी हम जो बाबर की औलादें नहीं बाहर निकलना चाहते हैं पूर्वाग्रह और पाखंड के इस मक़बरे से …

कहाँ तक ये फरेबे आरज़ू भी

कहाँ तक ये फरेबे-आरज़ू भी दगा दे जाएगा अपना लहू भी मुझे वो हर तरह आज़ाद करता मिटा देता हिसारे-रंगो-बू भी मुझे तो ज़ेहन दोजख सा मिला है मगर …

एक ख्वाबों का करबला होगा

एक ख़्वाबों का करबला होगा ख़ुश्क आँखों में और क्या होगा पेड़ साहिल पे जो खड़ा होगा राह मौज़ों की देखता होगा सैकड़ों लोग चाँद से होंगे कोई लेकिन …

उर्दू की मुख़ालिफ़त में

मैं नहीं चाहता कोई झरने के संगीत सा मेरी हर तान सुनता रहे एक ऊँची पहाड़ी प’ बैठा हुआ सिर को धुनता रहे। मैं अब झुंझलाहट का पुर-शोर सैलाब …

उपलब्धि

मैं तो बस झुंझलाना, ग़ुस्सा करना और चीख़ना जानता हूं मुझसे मत पूछो मेरी उपलब्धियों के बारे में मैं मंत्री, अभिनेता या क्रिकेट स्टार नहीं मुझे इक़रार है मैंने …

अगली दावत की प्रतीक्षा में

प्यार पनपता है मन में अपने आप बिना किसी प्रयत्न के जिस तरह जंगल में उग आते हैं असंख्य छोटे-छोटे पौधे लेकिन घृणा तैयार की जाती है कृत्रिम विधियों …

हक़ तुझे बेशक है, शक से देख, पर यारी भी देख

हक़ तुझे बेशक है, शक से देख, पर यारी भी देख ऐब हम में देख पर बंधु! वफ़ादारी भी देख हम ही हम अक्सर हुए हैं खेत, अपने मुल्क …

सुबह का चावल नहीं है, रात का आटा नहीं

सुबह का चावल नहीं है, रात का आटा नहीं किसने ऐसा वक़्त मेरे गाँव में काटा नहीं शोर है कमियों ही कमियों का हर इक लम्हा यहाँ मेरे घर …

वे ख़ामख़ाह हथेली पे जान रखते हैं

वे ख़ाम-ख़्वाह हथेली पे जान रखते हैं अजीब लोग हैं मुँह में ज़ुबान रखते हैं ख़ुशी तलाश न कर मुफ़लिसों की बस्ती में ये शय अभी तो यहाँ हुक़्मरान …