Author: Uttam

सोंचो

सोंचो कि सोंच सोंच कर कितना सुलझ सके हो उलझन को सुलझाने हेतु फिर उलझ चुके हो कितने ही चित्र बनते बिगड़ते हैं दिल दर्पण में फिर क्यों प्रियतम …

वो मजबूत धागा ढूँढता हूँ मैं

रोज देखता हूँ चाँद को पिघलते थोड़ा थोड़ा लम्बी रातों के बाद धूप की वो बूँदें बटोरता हूँ मैं उस रात सर्दियों में पटाखे छुटे थे कई निराले उन …

उस कृष्ण आवरण के पीछे कितना आलोक है

उस कृष्ण आवरण के पीछे कितना आलोक है! चांद तारों के महीन छिद्रों से झलकताहै जो, आखों को अनायास ही आकर्षित करता है जो, वह इस पर्दे को उठाने …

चलो आज फिर मिल कर एक नवीन देश बनाते हैं

चलो आज फिर मिल कर एक नवीन देश बनाते हैं ———————————- चलो आज फिर मिल कर एक नवीन देश बनाते हैं। भविष्य को ढकी जाति, धर्म, द्वेष के पर्दों …

इस दिवाली

इस दिवाली हर्ष उल्लास के इस उत्सव पर आशा के दीप जलाएँ इस दिवाली। इन्द्रधनुषी सपनों से ज्योतित अपनों के संग मनाएं इस दिवाली।। हर धर्म के निराले रंग …

मेरा स्वप्न अधूरा

मेरे आंसू फूल बन कर झडे हंसी के साथ उनके मुक्ताहारों से सजाया उनको, अश्रु मोतियों को बुन के उजाड़ कर आशा की वाटिका, किया तेरी हर अभिलाषा को …

श्याम, मोहे श्याम रंग में रंग दे

चाहे गोपियों सी सौत या बांसुरी का संग दे श्याम मोहे श्याम रंग में रंग दे नैन तो हमेशा श्याम मय हैं बालों की उलझी गुत्थी में भी श्याम …