Author: T. Shrinivas Rao

बेटी

मेरे इस हथेली में समा जाती थी, पोपले मुंह से मुस्कराकर मेरा हर ग़म,हर थकन मिटा देती थी । एक दिन नन्हें हाथो और नन्हें पैरों से इस हथेली …

उसकी आखें है ही ऐसी

जितना छुपाती है, उससे ज्यादा बोल देती है। उसकी आखें है ही ऐसी, सारे राज खोल देती है।। मै चीख चीख कर कहता हूं, किसी की समझ मे नहीं …