Author: "sadashubhani" nivedita

पता ही नहीं चलता हैं ..

कभी  कोई  वक़्त  पे  सम्हलता  हैं ..तो  किसी  के  हाथ  से  वक़्त  फिसलता  हैं …कब , कहाँ , कैसे  वक़्त  गुज़रता  हैं ..पता  ही  नहीं  चलता  हैं ..कभी  कोई  …

चाहतें ……

अंगड़ाई लेकर , आरामदायी चादर संग कुछ वक़्त सुकून से ,                                                                                              सोना चाहती हूं तंग भरी गलियों से निकलकर, वीराने जंगलों  से कुछ कहना चाहती  हूं कोरे कागज़ पर शब्द याद आते नहीं, लिखे शब्दों को, दोबारा लिखना चाहती हूं बड़ी हो रही हूं……. जिम्म्मेदारी ढोने से पहले, एक बार हठ करना चाहती हूं.  बच्ची थी…..फिर बच्ची बनना चाहती हूं दुनियां की लापरवाही में, अपनों की परवाह करना चाहती हूं ना जाने कब यह ज़िन्दगी अलविदा कह दे खुद से ज्यादा , एक बार किसी पे विश्वास करना चाहती हूं इस ज़िन्दगी के संघर्ष कई हैं… इनसे लड़कर थकने से पहले, बस, कुछ देर सुकून से सोना चाहती हूं….   Оформить и получить экспресс займ …

माँ

सबसे प्यारी हैं वो , सबसे न्यारी हैं वो, मुनिया हुईं मैं उसकी मेरी दुनिया सारी हैं वो. हर वक़्त मुझे उसका स्पर्श हैं वो मेरी ज़िन्दगी का आदर्श …

शब्दों का खेल हैं सब

शब्दों का खेल हैं सब भावों का मेल हैं सब शब्दों की महिमा हैं अपार शब्दों से जुड़ा हैं सारा संसार शब्दों ने ही तो साधे हैं रिश्तें शब्दों …