Author: मजबूर

मुफ़लिस

घिसते हैं जूते, घिसता कलम है घिस घिसके एड़ियाँ मरता भरम हैबुज़दिल की बस्ती में मुफ़लिस की हस्ती हैखाली सा पेट और हाथों में बेड़ियाँ Оформить и получить экспресс …

बिकाऊ

इश्क़ लिखो जान लिखो बोसा लिखो जाम लिखोकुछ सादा लिखो कुछ सस्ता लिखो के समझ तो आयेजो समझ न आये  कम्बख्त वो कैसे भाये?छपता है जो वो बिकता भी …

सार

मंदिर मस्जिद और बना ले एक दिन सब ढह जायेगा ईंट और पत्थर जोड़ता क्या खंडहर बन जायेगा लिखता क्या है फिर से नामापानी में बह जायेगा न तू …

इंक़लाब

बेफिक्र हूँ बेसब्र भीपर बेवजह नहींबेख़ौफ़ हूँ बेलौस हूँइन्तेहाँ नहीं उमंग हूँ तरंग हूँनिहंग हूँ मलंग हूँखुद से खुद ही दंग हूँ नायाब हूँ, बेताज हूँमैं लाल सवेरातूफ़ान हूँ …

चाँद

चिलमन के उस पार ही क्यों आते हो?कभी छुपते हो कभी धुँधले नज़र आते होरोज़ यूँ सताना भी क्या लाज़िम है?हाथ बढ़ाऊं तो भी क्या हासिल है? कभी आधे …

आज़ादी

परिंदों की हुर्रियत पे खुशी होती हैगर वो होते कहीं इन्सां की तरहकैद मुल्कों में नामुरादों की तरहकिसी परचम पे वो आज़ादी लुटाते होते Оформить и получить экспресс займ …

ललकार

लाचारगी की बेड़ियों को तोड़ जो न पायेगातनहा किसी कोठरी में खुद को टूटा पायेगा कब तलक तू दिल को अपने धोके से सहलायेगारोयेगा तू पर ना तुझपे कोई …

मेला

वतनपरस्ती का जैसे लगा है मेलासब लगाके बैठे हैं ठेलालगी है दूकानबिकता है सामानमुफ़लिस बना गद्दार अकेला कोई परचम के रंगकोई भूखे को दीनकोई ठाठ बेचता हैतो कोई ग़ुरूर …