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मानव व्यथा- निर्मल कुमार पाण्डेय

मानव व्यथा ********* याद नही आता कब की बातें शायद कल ही की हों स्मरण कर उस क्षण को जब झुरमुटों जंगलो बीहड़ो में मै नंगा निर्भीक और निश्छल …

प्रेम -निर्मल कुमार पाण्डेय

प्रेम मनुष्य ही नहीं जगती के प्रत्येक चराचर में एक समान पाया जाने वाल तत्व मुझे भी हुआ था शायद किसी से कभी तब, उसकी यादें करती परेशान पर …

कंचे- निर्मल कुमार पाण्डेय

सप्तरंगी स्वप्नदर्शी बहुरंगे उछलते बार बार टकराते, लड़ते ये कंचे कहते उछलो टकरावों और टकराते रहो जब तक उर्जा है तुम में *** अच्छे हैं कंचे ही हमसे टकराते …

अकर्मण्य ईश्वर- निर्मल कुमार पाण्डेय

ईश्वर सधे तीन अक्षर अपराधियों की फेहरिस्त में सबसे ऊपर कहते हैं, सृस्ती का रचयिता है सर्वगा है सब जानता है देखता है अतिवादियों को दंड औ भक्तो को …