Author: Niharika Mohan

सच्ची आस्था या ढ़ोंग?

वो है भी या नहीं?यदि है, तो कहाँ?कोई कहे उसे सर्वव्यापीकोई कहे है अंतर्ज्ञानी;कोई उसे महसूस करे,कोई बिना ही उसके गुज़ारा कर ले;कुछ रोज़ाना मंदिर जाएँ,कुछ पाँच दफे नमाज़ …

मैने एक ख्वाब देखा था…

मैने एक ख्वाब देखा था,पंख निकलते हीजहाँ नापने का ख्वाब;बेङियों से छूटते हीगलियों में थिरकने का ख्वाब;अंबर नज़र आते हीज़मीन पर न टिकने का ख्वाब;खामोशी की हवा सेबे-लवज़ बतियाने …

मैंने मयंक को देखा! – निहारिका मोहन

आज झरोखे से अचानक,मैंने, घूरते मयंक को देखालालिमा से प्रेरित हुएगोलाकार प्रकृति-अंग को देखा,शान्ति-सैलाब लिए हुएकोहराम को करते भंग देखा;चंद्रिका से इसकी हर ओरबढ़ती हुई उमंग को देखा,भीनी वायु …

अकेली थी आयी धरा पर…

अकेली थी आयी धरा पर, मैं अकेली ही रहूंगी; थिरकती गुनगुनाती समा मेंएक मौन पहेली ही रहूँगी । परिवर्तन का झोंका बेहता सदा से, बहकाता हर मन को यह …

आज की वास्तविकता…

कदम पहला ही रखते देखा मैंने,कुछ लोग, एक मुर्दे को ले जा रहे थे;पर हैरानी की बात है, एक भाईसाहबबेपरवाह हो मुस्कुरा रहे थे ! अस्पताल की नीरवता मेंउसका …

जूठन

खामोश हूँ मैं, कायर नहीं,बर्दाश्त कर लेती हूँ पर मैं बुज़दिल नहीं…शोषण की आदतहै पुराणी हो गयीसहलियाँ थीं कभी जो,सब बेगानी हो गयींजिस्म ने मेरे कभी,स्नेह को चखा नहीं…!खामोश …

मैं जल रही, तड़प रही, एक आग दिल में भड़क रही!

मैं जल रही, तड़प रहीएक आग दिल में भड़क रही!उम्मीद सपने खो दिए,निराशा में हम रो दिए;सिन्दूर दूसरे का पहनमेरी कोई पहचान नहीं!मैं जल रही, तड़प रहीएक आग दिल में …