Author: Mahendra singh Kiroula

करवाचौथ

यत्र व तत्र प्रेम शांति अमृतसती सावित्री नारी वो नारी जगत की जननी सत नमन युग का दुःख ह्रदय मे लुप्त कुसुम तुम पति अभी भी परमेश्वर रहा कलयुग …

कोरोना :शून्य की ध्वनि

आज बटोही न तू पथ का, बिकट शत्रु सच शक संवत का विनाशकारी अविष्कार सफल है, दुष्परिणाम मानव के हठ का   शून्य की ध्वनि को सुना आज है इसमें …

मन्नू की आत्मजा

मि मि मि मि बोल रही हैकरवट लेकर वो लेटी हैशायद अब पहचान हो गई४ महीने की मेरी बेटी हैमम्मी पल भर दूर चली तोउसको अब यत्र तत्र ढूंढतीलेकिन …

बिटिया : मेरी संजीवनी

मैं सात समुन्दर पार हु रहताहर पल जल थल छू के कहतानेत्र बांध करुणा के बल सेक्षतिग्रस्त हु उस धरातल पेझरोखे मैं आकर बिटिया पुकारेकैसे जियु बिन तेरे सहारेपापा …

प्रेम शांति और सामंजस्य

प्रेम शांति और सामंजस्य अपना लोफिर अमन का चिराग जलालोजो बीज नफरतो के बो गएवो अब सास्वत ही सो गएबृक्ष काँटों के हटा करएक फूलो का बागान लगा लोफिर अमन …

मन्नू : षष्टम अंक

ठंडा पानी भरने जाते एक एक लेकर ड्राम धनिया लहसुन मे नमक पीसकर उसमे खाते कच्चे आम ज्येठ के मास मे अक्सर फल पका करते थे अन्न का सारा …

मन्नू : चतुर्थ अंक

गुरुजी ने प्रश्न दिए एक दिवा मासिक परीक्षा ये थी प्रश्न गणित के १० थे उसमे कठिन समीक्षा ये थी सारे उत्तर गलत हुए और ०/१० आये नंबर इतना …

मन्नू : चतुर्दश अंक

मैंने उनसे प्रेम किया था ह्रदय मे शास्वत स्थान दिया था अक्सर उनको स्मरण करता था कृष्णा के रोज चरण पड़ता था जब भी अपना मेल हुआ था अमृत …

मन्नू : तृतीय अंक

लकड़ी की तख्ती, लकड़ी की कलम और मिटटी से भरी दवात पानी भरता था इसमें प्रतिदिन मस्सी भरने के शीध्र पश्चात ऐसे अक्षर पहचाने थे प्राथमिक पाठशाला गुमटी मे …

मन्नू: द्वितीय अंक

दादा दादी के पास था रहता कहानी सुनIदो उनको कहता नटखट उसके कृत्य निराले पर थोड़ा उसका नाक था बहता सन्त्रास पहनकर प्रतिदिन एक बड़ा कटोरा थाम चाय दे …

श्रावण संध्या

रिमझिम झिम बूंदे बारिश की शुन्य से चन्द्र की प्रतिमा खिसकी नभ पर कृष्ण बादल है छाया तारामंडल के ऊपर आया डरता नहीं डराता सबको मेरे संग घबराता उनको …

निकम्मे बच्चे

माँ अपने हाथो से खिला दे स्नेह से थोड़ा जल भी पिला दे ताकि बुद्धि मेरी बढ़ेगी बिद्या मेरे मस्तिस्क चढ़ेगी माँ ऐसा कर देती है ममता का जल …

मन्नू : प्रथम अंक

पिताजी कार्यरत वायुसेना में परिवार दिल्ली मे रहता था जन्म लिया था पालम मे हरकोई, मन्नू मन्नू कहता था कोई घुमाता साईकिल पर तो कोई खूब खिलाता था उनसे …

एक झलक

माथे पर स्वाभिमान का दर्पण चाल मे शोभा, शब्दों मे संगीत स्वर्ग लोक की अनुभूति होगी जिसके हो तुम मीत शारीरिक हाव – भाव है रहस्य भरे दृटि मे …

बेरोजगारी

बेरोजगारी है बेकारी जिससे मेरी माता हारी बेरोजगारी छाई है समाज के हर छोर जिससे मानव गिरता है नैतिक पतन की ओर मेरे देश को ग्रस्त कर गयी ये …

महेन की बुझती ज्योति

आज दुल्हन के लाल जोड़े मे, उसे सखियों ने सजाया होगा मेरी जान के गोरे हाथो को मेहँदी से रचाया होगा गहरा होगा मेहँदी का रंग उसमे नाम छुपाया …

एक फरेब : तेरी मोहब्बत

जब मैंने जाना नहीं था होती क्या है ये मोहब्बत ऐसे समय क्यों भेट की तुमने हमें ये झूटी रिश्वत क्यों दिखाई छाव मुझको जब था मै जीवन पथिक …