Author: Garima Mishra

पलायन

कहीं रात के सन्नाटे में, तो कहीं तपती दोपहरी में, मोहल्ले, कूचे, गलियों में, कुछ क़दमों ने शहर छोड़ा है। बस्तियों से दूर, बहुत दूर, उजड़ी, वीरान सड़कों पर, …

रिश्तों की उम्र

ओस की बूंदों से, जाड़े के कोहरे से,धूप में परछाई से, बादलों में इंद्रधनुष से,कब हमसे जुड़ जाते हैं, कब छूट जाते हैं..कुछ रिश्ते अपनी उम्र लेकर आते हैं..कुछ …

चुनाव और उम्मीदें

इस लम्बी सी कतार मेंलगी हैं मीलों लम्बी उम्मीदें,कुछ हैं बिजली-पानी सी,कुछ सर पर छत सी उम्मीदें…हर शख्स है चुपचाप खड़ा,पर नज़रें बातें करती हैं,हर चेहरे के मन की …

जंगल के सूखे पत्ते

जंगल के सूखे पत्ते एक कहानी कहते हैं,अब टहनी-टहनी पर कुछ उदास चेहरे रहते हैं…बरखा की राह तक-तक के हैं इनकी आँखें सूख चुकी,अब हरियाली की यादें और बातें …

दो आँखें

दूर किसी कोने से कुछ देख रही हैं दो आँखें,जल रहा है हर पेड़-पौधा, बगीचा-बाग़,घर-घर के आँगन में लगी है आग।कतरा-कतरा झुलस रही है चेहरों की मुस्कानतिनका-तिनका टूट रहा …

मेज़ पर पड़ी कलम

मेज़ पर पड़ी कलम पुकारती है तुझे,खींचती है तुझे भावों की डोरी से..सुनाती है कभी आधी, कभी पूरी कहानी,तेरे लफ़्ज़ों को गाती है अपनी ज़ुबानी..मेज़ पर पड़ी कलम पुकारती …

खयालों का शहर

हर मन में इक खयालों का शहर बसता है…इक ज़हरीले नाग सा, हमें धीरे-धीरे डसता है..बेमाने, बेख़ौफ़, बेपरवाह से हैं इस शहर के बाशिंदे…चीते की रफ़्तार से, बेलगाम घोड़ों …

परिभाषा अपंग की..

क्या हुआ गर मैं चल नहीं सकता,चलती है मेरी सांस,मेरा हर एहसास चलता है,हैं बहुत बातें ऐसीजिन पर मेरा दिल भी दौड़ता-उछलता है…मेरी आँखों मैं रौशनी नहीं,पर मैं बहुत …

यादें

कैसे बताऊँ मेरी यादें हैं कैसी,खट्टी-मीठी हैं यादें मेरे जैसी..बचपन के लड़कपन सी,जवानी के अल्हड़पन सीचवन्नी के बेर सीकहानियों के ढेर सीकैसे बताऊँ मेरी यादें हैं कैसी,खट्टी-मीठी हैं यादें …

ख़्वाब सो रहे हैं

बेसुध-बेफिक्र कुछ ख़्वाब सो रहे हैं,इन्हें सोने दो।अलसाए-सुस्ताये से अँगड़ाई लेते ख़्वाब,इन्हें सोने दो।सुना है ख़्वाबों की आँखें नहीं होती,पर नींद तो इन्हें भी आती होगी,कहने-सुनने की इनकी भी …

क्या तब भी तुम न बोलोगे

जब सॉंस-सॉंस पर हो भारी,हो ऑंखों पर पट्टी कारी,जब शब्दों पर सर कटने लगे,और बातों पर शव बिछने लगे,क्या तब भी तुम न बोलोगेऔर सत्य से ऑंखें मींचोगे…जब ‘कल्पना’ …

मेरे गाँव की सड़क

कहीं टूटती सी, कहीं फूटती सी, मेरे गाँव के बीच से गुज़रती ये टूटी-फूटी सड़क..जानती है दास्ताँ, हर कच्चे-अधपक्के मकान की, हर खेत,हर खलिहान की…ये सड़क जानती है,कब कल्लू …

बदलते रिश्ते

चिमनी से उठता हुआ धुंआ,कर रहा है बयान,किसी के घर की दास्ताँ…कहीं कुछ जल रहा है,बुझा दो, दो दिल राख न बन जाएँ…चल रहे हैं इस तेज़ी से,बेदर्द हवाओं …

चेहरा कोयले का…

कौशाम्बी की कपकपाती ठंडी में, कौड़ा तापते-तापते, एक ख्याल मन की गली से गुज़रा.. क्या ये लाल-लाल कोयले के टुकड़े,  आपस में बातें करते होंगे?  जलते-जलते अपने आखरी दम …