Author: के. एम. सखी

बदली कहाँ हालात की तस्वीर वही है

बदली कहाँ हालात की तस्वीर वही है करा है वही, पाँव की जंजीर वही है बदली हुई इस घर की हर इक चीज है लेकिन दीवार पे लटकी हुई …

अग्नि-वर्षा है तो है हाँ बर्फ़बारी है तो है

अग्नि वर्षा है तो है हाँ बर्फ़बारी है तो है, मौसमों के दरमियाँ इक जंग जारी है तो है । जिंदगी का लम्हा लम्हा उसपे भारी है तो है, …

मीर’ को कोई क्या पहचाने मेरी बस्ती में

मीर’ को कोई क्या पहचाने मेरी बस्ती में, सब शाइर हैं जाने-माने मेरी बस्ती में। आम हुए जिसके अफ़साने मेरी बस्ती में, वो मैं ही हूँ, कोई न जाने …

बहाना ढूंढ ही लेता है, खूँ बहाने का

बहाना ढूंढ ही लेता है खूँ बहाने का, है शौक कितना उसे सुर्ख़ियों में आने का। मिले हैं जख़्म उसे इस क़दर कि अब वो भी, कभी किसी को …

कोई पल भी हो दिल पे भारी लगे

कोई पल भी हो दिल पे भारी लगे, फ़ज़ा में अजब सोगवारी लगे। ये क्या हाल ठहरा, दिल-ए-ज़ार का, कहीं जाइए, बेक़रारी लगे। बहुत घुल चुका ज़हर माहौल में, …

पुल बनते दद्दा

तुम्हारी बूढ़ी आंखें और मूंठ वाली लाठी पुल बनते-बनते रुक जाती हैं दो गांवों के बीच रिश्तों की धार बार-बार तेज़ हो जाती है और बहा ले जाती है …

क्यों नहीं बनते सीमेंट

रेत की तरह क्यों भुरभुरे हो रामदहीन क्यों नहीं बनते सीमेंट और जोड़ते परिवार सोचो रामदहीन क्यों हो जाता है तुम्हारा घोंसला तार-तार गारे लगाते ईंट जोड़ते चालीस पहुँच …

ज़िंदगी लिखते हुए

हवा की सीढ़ियां चढ़ मिट्टी आकाश को उड़ रही उफ़नता समुद्र में डूबता सूर्य कुछ कहता रहा चांद के मौन पर जुगनुएं चीख़ती रहीं स्याह रातें कुछ अनकही कहती …

स्वर्ग-नरक

बचपन में बादलों की अंधेरी गुफा में डूबते सूर्य को देखा है मैंने कई बार और कई बार अंधेरे से उबरते उस प्रकाशपुंज को टुकड़ा-टुकड़ा फिर पूर्ण आकार लेते …

एक संपूर्ण आकार

हर सुबह खुलती है मेरी नींद मस्जिद की अज़ान से शुरू करता हूं अपनी दिनचर्या मंदिर की घंटियों के साथ मन को करता हूं शोधित गिरजा की कैरोल-ध्वनि पर …