Author: नादिर अहमद

यादें

मैं महाजन नहीं हिसाब किताब रखूँ प्यार में क्या पाया क्या खोया  जब कभी ख़ुदको बेबस-असहाय महसूस किया ख़ुद पर भरोसा नहीं रहा तुम्हारी ही यादें हिम्मत बनकर खड़ी …

सर जी

तुमने सोचा तो बहुत था हमें बेड़ियों में बाँध अपने इशारों पर नचाओगे चाबुक दिखाकर डराओगे  तुम आगे चलोगे हम तुम्हारे पीछे कटोरा लेकर दौड़ेंगे जब तुम्हारा जी चाहेगा …

भूलने की गलती

तुम्हारा पर्दाफाश हो रहा है   तुम्हारी चोरियाँ पकड़ी जा रही हैं वे सारे इल्ज़ाम जिनके लिए मुझे उम्र कैद हुई ज़िल्लत भरी ज़िंदगी नसीब हुई आज सारे सबूत …

आज मेरा स्कूल क्यों बंद है ?

आज मेरा स्कूल क्यों बंद है ?   जिसने  कभी मस्जिद का दरवाज़ा नहीं देखा जो कभी मंदिर की सीढ़ी नहीं चढ़ा जिसे अभी धर्म की परिभाषा मालूम नहीं …