Author: K K JOSHI

बचपन

जीवन के कुरूक्षेत्र में उग आयी दूब घास बूझ न पाया मन प्रायश्चित की किसे आस असंतुष्ट हूं किससे घर या दफ्तर के किस्से आंखों में तैरता पानी सूखे …

प्रेम गणित

आओ मेरे प्रेम केन्द्र में समा जाओ हृदय में मेरे प्रेम परिधि बना जाओ चहुंओर तुम्हारा प्रेम चर्तुभुज बसा है जैसे परकार में पेन्सिल को कसा है गाल गुलाबी …

तृप्ति

तृप्ति मिलेगी हृदय को अगर तुम न समझो इसे मात्र मेरी एक कविता यदि तुम समझोगी इसे अपने हृदय में मेरे प्रेम की स्वच्छंद सरिता तो निश्चित ही तुम्हारे …

आकाश

प्रफुल्लित मन है मौसम भी चंचल है मन में विचारों का सागर लक्ष्य हिमालय सा अटल है, खुशियों की मुस्कानों का फूलों की महक का हर आंगन में सार …

वह चांद जैसी लड़की

वह चांद जैसी लड़की इस दिल पर छा रही बातें उसकी प्यारी प्यारी हर अदा उसकी निराली मुझको प्यार बतला रही आंखों में उसकी शरारतें होंठों पे छायी मुस्कुराहटें …

कहां (हाईकू)

जीवन एक अनभिज्ञ भंवर सफर कहां, हवा अकेली महक की आस में बहार कहां, गुजारिशों में सुनहले परिन्दे हैं आकाश कहां, मन भटका अनजान राहों में डगर कहां, घरौंदा …

भ्रम

सूखे ढेर पर आग सदा से आती है दीये की लौ नीचे अंधेरा बन जाती है ये मासूमियत क्यों उभरी आंखों में उदासी बन कर मेरी आवाज क्यों बिखरी …

वेदना

झूम रहा दावानल मन में अंगार लिये बुझा दीप झूम रहा ज्वलित श्रृंगार लिये, हिमबर्फ यहां पिघली बंजर में बयार लिये मुक्त हुई मेघ कलाऐं छद्म अलंकार लिये, कोमल …

एहसास

तुम जब कभी मिलने आओ देखो हमको न बताना तुम कहीं आसपास भी होगी तो हमको न जताना एकाएक तुम्हारे होठों की फूलों सी मुस्कान आयेगी तो यह मौसम …

नूतन वर्ष मंगलमय

नववर्ष का शुभ आगमन है सौहार्द संग, उल्लास छाये चहुंओर बरसे प्रेम का रंग, अभिनंदन हृदय आंगन से हो सुखी अंग, कर्म पावन सुंदर हो जीवन वैभव ढंग, नववर्ष …

सर्द तरंग

सूर्य दिशा जो डगमगाई पत्तों में छुपे अन्धकार में पवन तेज सुलगती आई सितारों ने चन्द्रकांत संग निशा आंगन शीत बढ़ाई नहीं पतझड़ यह मौसम बसंत की हो रही …

वेदना

झूम रहा दावानल मन में अंगार लिये हिमबर्फ भी पिघली बंजर में बयार लिये मुक्त हुई मेघ कलाऐं छद्म अलंकार लिये ज्वालाऐं भी बहकी बुझते अहंकार लिये हृदय के …

गुनाहों की उम्र

निर्भया एक हाहाकार आज भी है जीवित मौसम बन हृदयों में भय फैला बस्तियों में, समयकाल बढ़ चला विचार भी अनेक बहे विद्वानों की गलियों में विकारों ने भी …

जीवन

अम्बर आंगन घने मेघों के साया मौसमों की निश्छ्ल तरंग वर्षा चंद्रलेख भिगोये अंग सूर्य हुआ मद्धम पवन ने पत्ते उड़ाये धरती की मर्म हरीतिमा में रंग सतरंगी इन्द्रधनुष …

भ्रम (हाईकू)

आधे अधूरे स्वप्न जीवन के प्रश्न सत्य के, अग्नि परीक्षा सुदीर्घ पथ पर प्रथा विचित्र, भोर लालिमा कौतूहल मानक निशा वर्जित, प्रेम श्रृंगार अतुलनीय सार सुख बयार, विविध रंग …

मंजिल

दोपहर की गरम धूप में वह चली जा रही रूकी ना एक क्षण कदमों की ताल बता रही, संग सखियां चंचल अधरों पर भाव अविरल जीवन पथ पर निरन्तर …