Author: dr Pravin Jaiprakash Gupta

मेरी मां

धुंधली पडती यादों के झूले में, मुझको आज झुला दे मां, मुझको मेरा बचपन फिर इक बार दिला दे मां. वो चूल्हे की सौंधी रोटी, फिर इक बार खिला …

ख़ुदा है तो नज़र आता क्यूं नहीं

शिवालों कलीसों से बाहर आता क्यूं नहीं, गर तू हर जगह है तो कहीं नज़र आता क्यूं नहीं. तुझ से बड़े इन ख़ुदाओं का ग़ुरुर हिलाता क्यूं नहीं, गर …

मेरी जवानी

रौशन जवानी के हंसी-कहकहे, महफ़िलें-मस्तियां, सिमट गये वो शामियाने, उजड़ गयी बस्तियां. जगमग- जगमग नज़ारे थे, हद में चांद-सितारे थे, सपनों की सीढ़ी चढ़, भर लिये जेब सारे थे. …