Author: Dr. Vivekanand Mishra

नव सामंतो कि खङी है अट्टालिकाएं . . . . .

नव सामंतो कि खङी है हर जगह अट्टालिकाए क्रुर सालो से लूटा है तोङ कर सारी सिमाए कैसे उसका गीत गाए क्या कहुँ मन कि ब्यथाए. . . . …

हूई है मानवता कि हार . . . . .

अतिशय लिप्सा भौतिकता की किया घृणित ब्यापार नाश कि मानव मुल्यो को किया अक्ष्म्य अपराध हूई है मानवता कि हार मनोविकार और अपसंस्कृति का दर्शन दिया सकार रुँध गए …