Author: गंगाधर ढोके

जिन दरख्तों की गहरी जड़े हैं

जिन दरख्तों की गहरी जड़े हैं वे आँधियों में तनके खड़े हैं के बारां से मुझको डरा मत तेरे घर भी कच्चे घड़े हैं सच इन्सां से लगने लगे …

प्रेम

चूक जाने के बाद भी बचा रहता है कजरौटे में अंजन जैसे सूखने के बाद नदी की रेत में बची रहती है नमी घोंसले में शेष रह जाते हैं पक्षियों  के पंख तुम्हारे जाने के बाद भी बचे हैं स्मृतियों के अवशेष जैसे बन्जारे  छोड़  जाते हैं खुली जमीन में अपने बसाहट के चिह्न  

ये ज़िन्दगी सवाल थी जवाब माँगने लगे

ये ज़िन्दगी सवाल थी जवाब माँगने लगे फरिश्ते आ के ख़्वाब मेँ हिसाब माँगने लगे इधर किया करम किसी पे और इधर जता दिया नमाज़ पढ़के आए और शराब …

तेरी हर बात मोहब्बत में गवारा करके

तेरी हर बात मोहब्बत में गवारा करके दिल के बाज़ार में बैठे हैँ ख़सारा  करके एक चिन्गारी नज़र आई थी बस्ती मेँ उसे वो अलग हट गया आँधी को इशारा …