Author: dhirajkumar taksande

आँखो से देखा

आखों से देखा अपने चांद तारे पानी मे हमने भी खुद को पाया इसी कहानी मे होने न होने से तेरे क्या फर्क पडता है बनकर मिटते देखा इसी …

इंसान कहनेवालो

इन्सान कहनेवालो इन्सानियत तो जान लो बिखरा पडा है सोना आखो अपने छान लो समशान जिन्दगीयो बर्बाद डाली डाली धनवान कहनेवालो धनवानियत तो जान लो दिल हो गये है …

मुसाफिर भी टूट जाता है

सिर्फ आशियां नहीं मुसाफिर भी टूट जाता है जिस राह से भी गुजरे सबकुछ लूट जाता है राहत तो मील जाती है रिश्तो की मांद में पत्थर की बौछाड़ …

किस मुले का है असर

किस मुले का है असर फैल रही है किड दोनो हाथों से लूट रही है नेताओकी भीड यहां लोकतंत्र को घात लगाते और संविधान को हात तोडनेवाले लगता है …

जब कभी हो हार

जब कभी हो हार समझो सफलताका है सार इन्सा है तु जानवर नही करना मत इन्सापे वार आदमी है ना की भगवान उसके भरोसे ना हो नैया पार सुख …

बिना सा हो सीने मे

बिना सा हो सीने में, वो जाए तो कहा जाए कीना सा हो जीने में, तो राहों में उखड़ जाए मुसाफ़िर है ये तन मेरा, कहां जाए वतन मेरा …