Author: अशोक धर

स्वाभिमानिनी

स्वाभिमानिनी उसने कहा द्रौपदी शरीर से स्त्री लेकिन मन से पुरूष है इसीलिए पाँच-पाँच पुरुषों के साथ निष्ठापूर्ण निर्वाह किया। नरसंहार में भी विचलित नहीं हुई ख़ून से सींचकर …

वे चाहती हैं लौटना

ये गयाना की साँवली-सलोनी , काले-लम्बे बालों वाली तीखे-तीखे नैन-नक्श, काली-काली आँखों वाली भरी-भरी , गदराई लड़कियाँ अपने पूर्वजों के घर, भारत वापस जाना चाहती हैं। इतने कष्टों के …

तुम अपनी बेटियों को…

तुम अपनी बेटियों को इन्सान भी नहीं समझते क्यों बेच देते हो अमरीका के नाम पर? खरीददार अपने मुल्क में क्या कम हैं कि… बीच में सात समुंदर पार …

चलो, फिर एक बार

चलो फिर एक बार चलते हैं हक़ीक़त में खिलते हैं फूल जहाँ महकता है केसर जहाँ सरसों के फूल और लहलहाती हैं फसलें हँसते हैं रंग-बिरंगे फूल मंड़राती हैं …

हिमपात नहीं हिम का छिड़काव हुआ है

कोलंबिया की सीढ़ियों से उतरते हुए शाम के नज़ारों ने रोक दिए कदम ठंडी हवा के झोंके ने सरसराहट पैदा की बदन में और आँखों को भा गई पक्के …

खयाल उसका हरएक लम्हा मन में रहता है

ख़याल उसका हर एक लम्हा मन में रहता है वो शमअ बनके मेरी अंजुमन में रहता है। कभी दिमाग में रहता है ख़्वाब की मानिंद कभी वो चाँद की …

किताबे-शौक में क्या क्या निशानियाँ रख दीं

किताबे-शौक़ में क्या-क्या निशानियाँ रख दीं कहीं पे फूल, कहीं हमने तितलियाँ रख दीं। कभी मिलेंगी जो तनहाइयाँ तो पढ़ लेंगे छुपाके हमने कुछ ऐसी कहानियाँ रख दीं। यही …

कभी रुक कर ज़रूर देखना

पतझड़ के सूखे पत्तों पर चलते हुए जो संगीत सुनाई पड़ता है पत्तों की चरमराहट का ठीक वैसी ही धुनें सुनाई पड़ती हैं भारी भरकम कपड़ों से लदे शरीर …

अमरीका हड्डियों में जम जाता है

वे ऊँचे-ऊँचे खूबसूरत “हाइवे” जिन पर चलती हैं कारें– तेज रफ़्तार से,कतारबद्ध, चलती कार में चाय पीते-पीते, टेलीफ़ोन करते, ‘टू -डॊर’ कारों में,रोमांस करते-करते, अमरीका धीरे-धीरे सांसों में उतरने …

मैं चाहता भी यही था वो बेवफ़ा निकले

मैं चाहता भी यही था वो बेवफ़ा निकले उसे समझने का कोई तो सिलसिला निकले किताब-ए-माज़ी  के औराक़ उलट के देख ज़रा न जाने कौन-सा सफ़्हा मुड़ा हुआ निकले जो देखने में …

रात के टुकड़ों पे पलना छोड़ दे

रात के टुकड़ों पे पलना छोड़ दे शम्अ से कहना के जलना छोड़ दे मुश्किलें तो हर सफ़र का हुस्न हैं, कैसे कोई राह चलना छोड़ दे तुझसे उम्मीदे- …

लहू न हो तो क़लम तरजुमाँ नहीं होता

लहू न हो तो क़लम तरजुमाँ नहीं होता हमारे दौर में आँसू ज़ुबाँ नहीं होता जहाँ रहेगा वहीं रौशनी लुटायेगा किसी चराग़ का अपना मकाँ नहीं होता ये किस …

हुस्न बाज़ार हुआ क्या कि हुनर ख़त्म हुआ

हुस्न बाज़ार हुआ क्या कि हुनर ख़त्म हुआ आया पलको पे तो आँसू का सफ़र ख़त्म हुआ उम्र भर तुझसे बिछड़ने की कसक ही न गयी , कौन कहता …

खुल के मिलने का सलीक़ा आपको आता नहीं

खुल के मिलने का सलीक़ा आपको आता नहीं और मेरे पास कोई चोर दरवाज़ा नहीं वो समझता था, उसे पाकर ही मैं रह जाऊंगा उसको मेरी प्यास की शिद्दत …

मिली हवाओं में उड़ने की वो सज़ा यारो

मिली हवाओं में उड़ने की वो सज़ा यारो के मैं ज़मीन के रिश्तों से कट गया यारो वो बेख़याल मुसाफ़िर मैं रास्ता यारो कहाँ था बस में मेरे उस …

क्या दुःख है, समंदर को बता भी नहीं सकता

क्या दुःख है, समंदर को बता भी नहीं सकता आँसू की तरह आँख तक आ भी नहीं सकता तू छोड़ रहा है, तो ख़ता इसमें तेरी क्या हर शख्स …

कितना दुश्वार है दुनिया ये हुनर आना भी

कितना दुश्वार है दुनिया ये हुनर आना भी तुझी से फ़ासला रखना तुझे अपनाना भी ऐसे रिश्ते का भरम रखना बहुत मुश्किल है तेरा होना भी नहीं और तेरा …