Author: Basudeo Agarwal

भक्ति छंद “कृष्ण-विनती”

भक्ति छंद “कृष्ण-विनती” दो भक्ति मुझे कृष्णा। मेटो जग की तृष्णा।। मैं पातक संसारी। तू पापन का हारी।। मैं घोर अनाचारी। तू दिव्य मनोहारी।। चाहूँ करुणा तेरी। दे दो …

धार छंद “आज की दशा”

धार छंद “आज की दशा” अत्याचार। भ्रष्टाचार। का है जोर। चारों ओर।। सारे लोग। झेलें रोग। हों लाचार। खाएँ मार।। नेता नीच। आँखें मीच। फैला कीच। राहों बीच।। पूँजी …

सुजान छंद (पर्यावरण)

पर्यावरण खराब हुआ, यह नहिं संयोग। मानव का खुद का ही है, निर्मित ये रोग।। अंधाधुंध विकास नहीं, आया है रास। शुद्ध हवा, जल का इससे, होय रहा ह्रास।। …

सोरठा “राम महिमा”

मंजुल मुद आनंद, राम-चरित कलि अघ हरण। भव अधिताप निकंद, मोह निशा रवि सम दलन।। हरें जगत-संताप, नमो भक्त-वत्सल प्रभो। भव-वारिध के आप, मंदर सम नगराज हैं।। शिला और …

दोहे “होली”

होली के सब पे चढ़े, मधुर सुहाने रंग। पिचकारी चलती कहीं, बाजे कहीं मृदंग।। दहके झूम पलाश सब, रतनारे हो आज। मानो खेलन रंग को, आया है ऋतुराज।। होली …

सायली (होली)

सायली (होली) होली पावन त्योहार जीवन में लाया रंगों की बौछार। ********* होली जला देती अत्याचार, कपट, छल निष्पाप भक्त बचाती। ********* होली लाई रंग हों सभी लाल खेलें …

मौक्तिका (रोती मानवता)

मौक्तिका (रोती मानवता) 2*14 (मात्रिक बहर) (पदांत ‘मानवता’, समांत ‘ओती’) खून बहानेवालों को पड़ जाता खून दिखाई, जो उनके हृदयों में थोड़ी भी होती मानवता। पोंछे होते आँसू जीवन …

नवगीत (भगवन चाटुकार मैं भी बन जाऊँ)

नवगीत (भगवन चाटुकार मैं भी बन जाऊँ) भगवन चाटुकार मैं भी बन जाऊँ। बन्द सफलताओं पे पड़े तालों की कुँजी पा जाऊँ।। विषधर नागों से नेता, सत्ता वृक्षों में …

आल्हा छंद “अग्रदूत अग्रवाल”

आल्हा छंद “अग्रदूत अग्रवाल” अग्रोहा की नींव रखे थे, अग्रसेन नृपराज महान। धन वैभव से पूर्ण नगर ये, माता लक्ष्मी का वरदान।। आपस के भाईचारे पे, अग्रोहा की थी …

सार छंद “भारत गौरव”

सार छंद “भारत गौरव” जय भारत जय पावनि गंगे, जय गिरिराज हिमालय; सकल विश्व के नभ में गूँजे, तेरी पावन जय जय। तूने अपनी ज्ञान रश्मि से, जग का …

गीतिका (अभी तो सूरज उगा है)

गीतिका (अभी तो सूरज उगा है) प्रधान मंत्री मोदी जी की कविता की पंक्ति से प्रेरणा पा लिखी गीतिका। (मापनी:- 12222  122) अभी तो सूरज उगा है, सवेरा यह कुछ नया …

शालिनी छन्द (“राम स्तवन”)

शालिनी छन्द (“राम स्तवन”) हाथों में वे, घोर कोदण्ड धारे। लंका जा के, दैत्य दुर्दांत मारे।। सीता माता, मान के साथ लाये। ऐसे न्यारे, रामचन्द्रा सुहाये।। मर्यादा के, आप …

शार्दूलविक्रीडित छंद “हिन्दी यशोगान”

शार्दूलविक्रीडित छंद “हिन्दी यशोगान” हिन्दी भारत देश के गगन में, राकेश सी राजती। भाषा संस्कृत दिव्य हस्त इस पे, राखे सदा साजती।। सारे प्रांत रखे कई विविधता, देती उन्हे एकता। हिन्दी से पहचान है जगत में, देवें इसे भव्यता।। …

शिखरिणी छंद (“भारत वंदन”)

शिखरिणी छंद (“भारत वंदन”) बड़ा ही प्यारा है, जगत भर में भारत मुझे। सदा शोभा गाऊँ, पर हृदय की प्यास न बुझे।। तुम्हारे गीतों को, मधुर सुर में गा …

स्रग्धरा छंद “शिव स्तुति”

स्रग्धरा छंद “शिव स्तुति” शम्भो कैलाशवासी, सकल दुखित की, पूर्ण आशा करें वे। भूतों के नाथ न्यारे, भव-भय-दुख को, शीघ्र सारा हरें वे।। बाघों की चर्म धारें, कर महँ …

हरिणी छंद “राधेकृष्णा नाम-रस”

हरिणी छंद “राधेकृष्णा नाम-रस” मन नित भजो, राधेकृष्णा, यही बस सार है। इन रस भरे, नामों का तो, महत्त्व अपार है।। चिर युगल ये, जोड़ी न्यारी, त्रिलोक लुभावनी। भगत …

ग़ज़ल (जब तलक उनकी करामात)

बह्र:- 2122 1122 1122 22 जब तलक उनकी करामात नहीं होती है, आफ़तों की यहाँ बरसात नहीं होती है। जिनकी बंदूकें चलें दूसरों के कंधों से, उनकी खुद लड़ने …

ग़ज़ल (बुझी आग फिर से जलाने लगे हैंं)

भुजंगप्रयात छंद आधारित (122*4) ग़ज़ल (बुझी आग फिर से जलाने लगे हैंं) बुझी आग फिर से जलाने लगे हैं, वे फितरत पुरानी दिखाने लगे हैं। गुलों से नवाजा सदा …

अनुष्टुप छंद “गुरु पंचश्लोकी”

अनुष्टुप छंद “गुरु पंचश्लोकी” सद्गुरु-महिमा न्यारी, जग का भेद खोल दे।वाणी है इतनी प्यारी, कानों में रस घोल दे।। गुरु से प्राप्त की शिक्षा, संशय दूर भागते।पाये जो गुरु …

करवा चौथ पर आरती

करवा चौथ पर आरती ओम जय पतिदेव प्रियेस्वामी जय पतिदेव प्रिये।चौथ मात से विनती-2शत शत वर्ष जिये।। कार्तिक लगते आई, चौथ तिथी प्यारी।करवा चौथ कहाये, सब से ये न्यारी।।ओम …

आँसू छंद “कल और आज”

आँसू छंद “कल और आज” भारत तू कहलाता था, सोने की चिड़िया जग में। तुझको दे पद जग-गुरु का, सब पड़ते तेरे पग में। तू ज्ञान-ज्योति से अपनी, संपूर्ण …

अहीर छंद “प्रदूषण”

अहीर छंद “प्रदूषण” बढ़ा प्रदूषण जोर। इसका कहीं न छोर।। संकट ये अति घोर। मचा चतुर्दिक शोर।। यह भीषण वन-आग। हम सब पर यह दाग।। जाओ मानव जाग। छोड़ो …

“जागो भाग्य विधाताओं”

मनहरण घनाक्षरी आधारित जागो भाग्य विधाताओं (प्रति चरण 8+8+8+7 वर्णों की रचना) देखा अजब तमाशा, छायी दिल में निराशा, चार गीदड़ ले गये, मूँछ तेरी नोच के। सोये हुए …