Author: एझाझ अहमद

जलते हुए दील को बुझाये भी तो कैसे ?

जलते हुए दील को बुझाये भी तो कैसे ? मलबे से फीर घर बनाये भी तो कैसे ? अाँखो से आँसु बेवकत बेहते रेहते है होटो पे मुसकुराहट सजाये …