Author: अनिल जनविजय

असाध्य वीणा / अज्ञेय / पृष्ठ 5

राजा ने अलग सुना : “जय देवी यश:काय वरमाल लिये गाती थी मंगल-गीत, दुन्दुभी दूर कहीं बजती थी, राज-मुकुट सहसा हलका हो आया था, मानो हो फल सिरिस का …

असाध्य वीणा / अज्ञेय / पृष्ठ 4

“मुझे स्मरण है उझक क्षितिज से किरण भोर की पहली जब तकती है ओस-बूँद को उस क्षण की सहसा चौंकी-सी सिहरन। और दुपहरी में जब घास-फूल अनदेखे खिल जाते …

असाध्य वीणा / अज्ञेय / पृष्ठ 3

मैं सुनूँ, गुनूँ, विस्मय से भर आँकू तेरे अनुभव का एक-एक अन्त:स्वर तेरे दोलन की लोरी पर झूमूँ मैं तन्मय– गा तू : तेरी लय पर मेरी साँसें भरें, …

असाध्य वीणा / अज्ञेय / पृष्ठ 2

सौंप रहा था उसी किरीटी-तरु को कौन प्रियंवद है कि दंभ कर इस अभिमन्त्रित कारुवाद्य के सम्मुख आवे? कौन बजावे यह वीणा जो स्वंय एक जीवन-भर की साधना रही? …

सागर और धरा मिलते थे जहाँ

सागर और धरा मिलते थे जहाँ सन्धि-रेख पर मैं बैठा था । नहीं जानता क्यों सागर था मौन क्यों धरा मुखर थी । सन्धि-रेख पर बैठा मैं अनमना देखता …

व्यथा सब की

व्यथा सब की, निविड़तम एकांत मेरा । कलुष सब का स्वेच्छया आहूत; सद्यःधौत अन्तःपूत बलि मेरी । ध्वांत इस अनसुलझ संसृति के सकल दौर्बल्य का, शक्ति तेरे तीक्ष्णतम, निर्मम, …

ओ मूर्त्ति !

ओ मूर्त्ति ! वासनाओं के विलय, अदम आकांक्षा के विश्राम ! वस्तु-तत्त्व के बंधन से छुटकारे के ओ शिलाभूत संकेत, ओ आत्म-साक्षय के मुकुर, प्रतीकों के निहितार्थ ! सत्ता-करुणा, …

उस बीहड़ काली एक शिला पर बैठा दत्तचित्त

उस बीहड़ काली एक शिला पर बैठा दत्तचित्त- वह काक चोंच से लिखता ही जाता है अविश्राम पल-छिन, दिन-युग, भय-त्रास, व्याधि-ज्वर, जरा-मृत्यु, बनने-मिटने के कल्प, मिलन-बिछुड़न, गति-निगति-विलय के अन्तहीन …

मैं कवि हूँ

मैं कवि हूँ दृष्टा, उन्मेष्टा, संधाता, अर्थवाह, मैं कृतव्यय । मैं सच लिखता हूँ : लिख-लिख कर सब झूठा करता जाता हूँ । तू काव्य : सदा-वेष्टित यथार्थ चिर-तनित, …

जो कुछ सुन्दर था, प्रेम, काम्य

जो कुछ सुन्दर था, प्रेय, काम्य, जो अच्छा, मँजा नया था, सत्य-सार, मैं बीन-बीन कर लाया नैवेद्य चढ़ाया । पर यह क्या हुआ ? सब पड़ा-पड़ा कुम्हलाया, सूख गया …