राष्ट्र की खातिर- शिशिर मधुकर

एक मेरे मित्र हैं जो मुझसे बहुत नाराज़ हैं उनको पसंद आते ना मेरे मलमली अल्फ़ाज़ हैं राष्ट्र की खातिर वो कहते हैं की मैं रचना लिखूं एक भारत माँ के ही चरणों में नित नित झुकूं ढूंढ़ता हूँ जब मगर मैं राष्ट्र जैसी चीज़ को देखता हूँ वृक्ष बनता चहुँ और बस विष बीज को वोट की खातिर जहाँ अपमान मेघा का हुआ ना किसी नेता की वाणी ने मेरे मन को छुआ भीड़ को ही साथ रखना बस जहाँ एक धर्म हो शास्त्र सम्मत उच्च कोटि कैसे वहां फिर कर्म हो कौवों की सभा में तुम्हीं कहो कोयल कहाँ से गाएगी घृणा भरे समाज में क्या कभी राष्ट्र भक्ति आएगी। शिशिर मधुकर

Оформить и получить экспресс займ на карту без отказа на любые нужды в день обращения. Взять потребительский кредит онлайн на выгодных условиях в в банке. Получить кредит наличными по паспорту, без справок и поручителей

16 Comments

  1. Vivek Singh 20/07/2017
    • Shishir "Madhukar" 20/07/2017
  2. डी. के. निवातिया 20/07/2017
    • Shishir "Madhukar" 20/07/2017
  3. kiran kapur gulati 20/07/2017
    • Shishir "Madhukar" 20/07/2017
  4. Bindeshwar Prasad sharma 20/07/2017
    • Shishir "Madhukar" 20/07/2017
  5. ANU MAHESHWARI 20/07/2017
    • Shishir "Madhukar" 21/07/2017
  6. babucm 21/07/2017
    • Shishir "Madhukar" 21/07/2017
  7. Madhu tiwari 21/07/2017
    • Shishir "Madhukar" 21/07/2017
  8. arun kumar jha 21/07/2017
    • Shishir "Madhukar" 21/07/2017

Leave a Reply